पंजाब में लोकसभा चुनाव में कई सीटों पर अपने ही पराए के किरदार में आ गए हैं। अपनों के उग्र तेवर से कई प्रत्याशी मुसीबत में पड़ गए हैं और उम्मीदवारों को सियासी गणित बिगड़ने का डर सता रहा है।मालवा की कई सीटों संगरूर, पटियाला, बठिंडा पर ऐसे हालात बन रहे हैं।
संगरूर सीट पर अकाली दल के प्रत्याशी को लेकर माहौल गर्म है। यहां पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखदेव सिंह ढींडसा के बेटे परमिंदर ढींढसा (पूर्व वित्त मंत्री) टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे थे, लेकिन पार्टी ने एडवोकेट इकबाल सिंह झूंदा को चुनाव मैदान में उतार दिया। सियासी जानकारों का मानना है कि यदि ढींडसा समर्थकों के तेवरों में तल्खी रही तो वोट बैंक का बड़ा हिस्सा किसी भी प्रत्याशी के लिए ‘वरदान’ साबित हो सकता है। इस पूरे मामले पर अन्य दलों के प्रत्याशी भी नजर बनाए हुए हैं और ढींडसा को टिकट नहीं दिए जाने के पार्टी के फैसले पर सवाल उठाकर ढींडसा समर्थकों को अपने पाले में लाने की कोशिश में जुट गए हैं, लेकिन ढींडसा समर्थक फिलहाल अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं। कांग्रेस के लिए भी कई अपने अब पराए की भूमिका में आकर मुसीबत बढ़ा रहे हैं। दलबीर सिंह गोल्डी पहले ही कांग्रेस छोड़कर आप में चले गए हैं। इसके अलावा कई नेता चुप बैठे हैं। आम आदमी पार्टी के लिए उन्हीं के नाराज नेता व वॉलंटियर्स मुसीबत बढ़ा रहे हैं। आप के दिग्गज नेता अब नाराज वाॅलंटियर्स पर डोरे डाल रहे हैं।
पटियाला सीट से डॉ. धर्मवीर गांधी को टिकट देने से कांग्रेस के भीतर मचा घमासान अब कुछ हद तक शांत हो गया है। कांग्रेस के दिग्गज नेता पूर्व कैबिनेट मंत्री लाल सिंह, पूर्व विधायक हरदयाल सिंह कंबोज, महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष गुरशरण कौर रंधावा और मदन लाल जलालपुर समेत अन्य नेता पहले विरोध कर रहे थे और अब हालात बदल गए हैं। कुछ नेता खुलकर कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हैं, किंतु हालात पूरी तरह से दुरुस्त नहीं हुए हैं।
पटियाला सीट पर कंबोज बिरादरी का अच्छा खासा वोट बैंक है और इस बिरादरी से संबंधित नेताओं का मिजाज सियासत का रुख तय कर सकता है। नाराजगी भरे तेवरों पर महाराजा पटियाला (कैप्टन अमरिंदर सिंह) अपनी नजर बनाए हुए हैं। कांग्रेस में रहते हुए कैप्टन के यहां के नेताओं के साथ अच्छे ताल्लुक रहे हैं। ऐसे में कैप्टन अपनी पत्नी और भाजपा प्रत्याशी परनीत कौर की राह में बिछे कांटों को दूर करने की कोशिश कर सकते हैं। भाजपा के टकसाली नेताओं की खामोशी और किसानों का विरोध अच्छे संकेत नहीं दे रहा है। वहीं, आप को पूरी तरह से समर्पित रहने वाले वाॅलंटियर्स की कम होती संख्या पार्टी के लिए सिरदर्द बन रही है।
सभी ने झोंकी पूरी ताकत
बठिंडा सीट की स्थिति पेचीदा बनी हुई है। वरिष्ठ अकाली नेता सिकंदर सिंह मलूका की पुत्रवधू परमपाल कौर सिद्धू व बेटे गुरप्रीत सिंह मलूका ने भाजपा का दामन थामने और भाजपा की ओर से परमपाल कौर को चुनाव मैदान में उतारने से समीकरण बदल रहे हैं। तलवंडी साबो से चार बार के विधायक व कांग्रेस के प्रत्याशी जीत मोहिंदर सिंह सिद्धू, अकाली दल से विधायक रह चुके हैं। युवाओं में लोकप्रिय लक्खा सिधाना भी चुनाव मैदान में हैं।
हरसिमरत कौर बादल यहां से लगातार तीन जीत के बाद चौथी बार मैदान में हैं। अपनों की भूमिका यहां भी सवालों के घेरे में है। अपनों के गर्म मिजाज को ठंडा करने और कोर वोट बैंक को साधने के लिए बादल परिवार ने पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा व आप को यहां किसानों के तीखे विरोध का सामना करना पड़ रहा है। सिद्धू मूसेवाला के पिता बलकौर सिंह के तेवर सत्ताधारी पार्टी के लिए सिरदर्द बन रहे हैं। बहरहाल, पंजाब में चुनाव प्रचार ने गति पकड़ ली है। उम्मीदवारों को भितरघात का अहसास है और उम्मीदवार सियासी समीकरण को साधने के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना कर विरोधियों को पटकनी देने की पटकथा तैयार करने में जुट गए हैं, लेकिन अपनों की भूमिका का सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा यह आने वाला वक्त बताएगा।