दर्द से परेशान लोगों के लिए पीजीआई की न्यू ओपीडी का रूम नं. 5023 बहुत बड़ी राहत बनकर आया है। एनेस्थीसिया डिपार्टमेंट की ओर से संचालित होने वाले रूम में तरह-तरह के दर्द दूर किए जा रहे हैं।
इससे उन मरीजों को सबसे बड़ी परेशानी दूर हुई है, जो पिछले कई महीने से भयंकर दर्द से पीड़ित थे। इनमें कैंसर पेशेंट, सर्जरी के बाद होने वाले दर्द और स्लिप डिस्क दर्द से पीड़ित मरीज शामिल थे।
दर्द दूर करने के लिए कुछ मेडिसिन और इंजेक्शन है। पहले दवाओं की सहायता से दूर किया जाता है। जब आराम नहीं मिलता तो उसके बाद इंजेक्शन का सहारा लिया जाता है।
कई प्रकार के होते हैं दर्द
पेन क्लीनिक की कंसलटेंट व एनेस्थीसिया विभाग की एडिशनल प्रोफेसर डा. बबिता घई ने बताया कि दर्द कई प्रकार के होते हैं। इनमें प्रमुख रूप से क्रोनिक पेन, एक्यूट पेन और कैंसर पेन।
क्रोनिक पेन उसे कहते हैं, जब किसी जगह पर तीन से चार महीने तक दर्द हो। एक्यूट पेन तब होता है जब सर्जरी के बाद दर्द उठता है।
यह दर्द काफी भयंकर होता है। तीसरा कैंसर पेन होता है। कैंसर की तीसरी व चौथी स्टेज में रोगी को बहुत दर्द होता है। डाक्टर भी इन दर्द को समझ नहीं पाते। वे पेनकिलर देते रहते हैं, लेकिन फिर भी आराम नहीं मिलता।
उन्होंने बताया कि इसका एक प्रमुख कारण डाक्टरों व नर्सों के पाठ्यक्रम में पेन मैनेजमेंट कोर्स का शामिल न होना है। नर्सिंग स्कूलों में भी अब तक पेन मैनेजमेंट से संबंधित कोई पाठ्यक्रम शामिल नहीं किया गया है।
नर्सों को ट्रेंड करने के लिए मिली ग्रांट
डा. बबिता ने बताया कि मरीजों के पेन को दूर करने के लिए नर्सेंज अहम रोल निभा सकती हैं, क्योंकि मरीज के पास वे ज्यादा समय तक रहती हैं।
हाल ही में इंटरनेशनल एसोसिएशन फार स्टडी आफ पेन की ओर से डा. बबिता को दस हजार यूएस डालर की ग्रांट मिली है। इस ग्रांट की मदद से वे नर्सों को एक साल तक पेन मैनेंटमेंट की बारीकियों से अवगत कराती रहेंगी।
बीते 28 अगस्त को ट्रेनिंग का पहला चरण भी पूरा हो चुका है। इस वर्कशॉप का उद्घाटन पीजीआई डायरेक्टर प्रोफेसर वाइके चावला ने किया था।
कोट
यह एक रेफरल क्लीनिक है। यहां पर डिपार्टमेंट से रेफर करने के बाद मरीज आते हैं। फिर भी यदि कोई मरीज डायरेक्ट चला आता है, तब भी उसे देखा जाता है। यह क्लीनिक बुधवार और शनिवार को चलता है। दर्द से लोग इतने परेशान हो जाते हैं कि लोगों की नौकरी छूट जाती है। लोग मानसिक तनाव में आ जाते हैं।
- डा. बबिता घई, एडिशनल प्रोफेसर एनेस्थीसिया डिपार्टमेंट