मैं जब चौबीस साल का था तो तंबूरा सीखने की चाहत हुई। बस इसी चाह में कबीर पंथ पढ़ना और कबीर के बारे में जानने के लिए प्रेरित हुआ। मैं तंबूरा कबीर दास के भजनों पर बजाया करता था और उन्हीं के दोहे और साखियां पढ़ने के बाद मैंने अपना पूरा जीवन कबीर दास के संदेशों को लोगों तक पहुंचाने का बेड़ा उठाया।
यह कहना है अंतरराष्ट्रीय गायक डा. प्रलाद सिंह तिपानिया पद्मश्री का। वह पंजाब कला भवन सेक्टर-16 में शुक्रवार को एक शाम सतगुरू कबीर के नाम पेश करेंगे। उन्होंने कबीर दास से जुड़े किस्सों को प्रेसवार्ता में साझा किया। उन्होंने कहा कि वह अपने कार्यक्रम के दौरान देश विदेशों में सैर कर चुके हैं।
इन्होंने देखा कि युवा पीढ़ी तेज गीतों को काफी तवज्जो देती है। सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए भारत में रिसर्च वर्क पर ध्यान नहीं दिया जाता। इसी वजह से युवा पीढ़ी संस्कृति कार्यक्रमों पर ध्यान नहीं दे पा रही। बात करें कबीर दास के दोहे और भजनों की तो कबीर दास के बहुत से भजन लिखे नहीं गए।
इनपर लोग काम करके राजी नहीं। उन्होंने कहा कि विदेशों में कई कंसर्ट किए। वहां देखा कि लोग हिंदी सीखने के संग भारतीय संस्कृति को अपनाने के लिए इच्छुक रहते हैं।
भारत से ज्यादा विदेशों में भारतीय कल्चर को अपनाया जाता है। वहां की पढ़ाई में हिंदी रिलीजन सब्जेक्ट कंपलसरी है। इससे विदेशी भारतीय संस्कृति को भारतीय लोगों से ज्यादा समझते है।