महिला अधिकारियों ने कहा-काम के बीच जब मौका मिले बच्चों को समय दें
एक मां को अपने परिवार और बच्चे के पालन-पोषण से ज्यादा कोई काम महत्वपूर्ण नहीं लगता है लेकिन जब वह नौकरी करती हों तो दोहरी जिम्मेदारी निभाना एक चुनौती बन जाती है। खासकर एक महिला अधिकारी के लिए शहर की योजनाएं तैयार करना और परिवार को संभालना थोड़ा मुश्किल होता है। ऐसे में परिवार का साथ काफी महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में कामकाजी महिलाओं को जब मौका मिले बच्चों को समय दें। उनसे अपने अनुभव साझा करें और उनकी गतिविधियों के बारे में भी पूछें, ताकि मां और बच्चे के बीच एक दोस्ती का संबंध बना रहे।
मां की गतिविधियों पर बच्चे ज्यादा देते हैं ध्यान : आनिंदिता मित्रा
निगम आयुक्त आनिंदिता मित्रा बतातीं हैं कि वर्ष 2009 में वह रोपड़ में एसडीएम के पद पर पदस्थ थीं। उस समय उनकी बेटी करीब साढ़े तीन साल की थी। परिवार और बच्चे के बीच तालमेल बनाने के लिए वह बिटिया को अपने साथ दफ्तर लेकर आती थीं। इसके बाद सुबह स्कूल भेजने के बाद वहां से सीधे दफ्तर में ले आती थीं। बेटी की बेहतर परवरिश में मां का काफी साथ मिला। अभी भी सुबह 6 से रात 12 बजे तक काम हो जाता है तो बिटिया को अखरता नहीं है। क्योंकि वह समय से पहले समझदार हो गई और मदद करती है। हम बच्चों को जो नसीहत देते हैं उससे ज्यादा हम जो करते हैं उस पर बच्चे ज्यादा ध्यान देते हैं। इसलिए परिजनों को अपने काम के जरिए ही उन्हें बेहतर संदेश देना चाहिए।
काम को बांटकर परिवार का सहयोग लें : नितिका पवार
प्रशासन में पर्सोनल विभाग की सचिव नितिका पवार बतातीं हैं कि वर्ष 2012 में नौकरी लगी। इसके बाद विवाह हुआ। उनकी चार साल की एक बेटी है। काम के साथ बेटी को दिनभर में चार से पांच घंटे दे पाती हैं लेकिन जितना समय देती हैं उस समय पूरी तरह से मां की भूमिका निभाती हैं। उस समय ऑफिसर वाली भूमिका नहीं होती है। एक महिला के लिए जरूरी है कि वह स्वस्थ रहे। क्योंकि परिवार और काम की दोनों जिम्मेदारी उसे निभानी है। इसलिए उसे अपने काम को बांटकर परिवार का सहयोग लेना चाहिए।
बच्चों को चुनौतियों की कहानी सुनाएं: शालिनी चेतल
समाज कल्याण अधिकारी और संयुक्त आयुक्त शालिनी चेतल बतातीं हैं कि वर्ष 2008 में उनकी नौकरी लगी थी। उनके दो बेटे हैं। उस समय परिवार का साथ न होता तो काफी मुश्किल होती लेकिन संयुक्त परिवार होने के कारण काफी सहयोग मिला। अभी चंडीगढ़ में अकेली रहती हैं। पति हरियाणा में मुख्य चिकित्सा अधिकारी हैं। दोनों ही बच्चों के लिए मुश्किल से समय निकाल पाते हैं लेकिन जेठानी का पूरा सहयोग मिलता है। वर्तमान में संयुक्त परिवार कम हो रहे हैं। कामकाजी परिवार के लोगों को अपनी मुश्किलें बच्चों से साझा नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपनी साहस की कहानी सुनानी चाहिए, ताकि बच्चे भी हर चुनौती का सामना कर सकें।
घर और काम दोनों जगह बच्चों की जिम्मेदारी: पालिका अरोड़ा
शिक्षा निदेशक पालिका अरोड़ा बतातीं हैं कि उनकी तीन साल की बेटी है। चंडीगढ़ आने के बाद उन्हें शिक्षा विभाग जैसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली। ऐसे में घर और काम दोनों जगह बच्चों की जिम्मेदारी मिलने से एक मां की भूमिका महत्वपूर्ण दिखी। घर पर परिवार का सहयोग मिला तो बेटी की देखभाल की चिंता कम हुई। ऐसे में स्कूल के बच्चों के लिए बेहतर काम करने का भी बीड़ा मजबूती से उठाया। पति पंजाब पुलिस में होने के कारण उनके ऊपर जिम्मेदारी ज्यादा है। इसलिए दफ्तर के बाद जो समय मिलता है बेटी को देती हैं।