चंडीगढ़। दिल्ली नगर निगम में शुक्रवार को हुए हंगामे ने बीते साल चंडीगढ़ मेयर चुनाव की यादें ताजा कर दीं। पिछले साल मेयर बनाने के लिए आम आदमी पार्टी (आप) और भाजपा के बीच काफी गहमागहमी हुई थी। मेयर बनने के बाद भी सरबजीत कौर को कुर्सी तक पहुंचने के लिए मशक्कत करनी पड़ी थीं। हंगामे की स्थिति यह थी कि विरोध कर रहे पार्षदों को मार्शलों से कह कर बाहर निकलवाना पड़ा था। इस बार 17 जनवरी को भी कुछ ऐसे ही हालात बनने जा रहे हैं। आप ने दावा करना शुरू कर दिया है कि मेयर उनका होगा, वहीं भाजपा की ओर से नये मेयर उम्मीदवार के लिए खोज शुरू हो गई है।
दिल्ली और चंडीगढ़ की सर्दी में दोनों प्रदेशों की सियासी गर्मी का तड़का लगा है। दिल्ली निगम में हुए हंगामे ने चंडीगढ़ निगम चुनाव को लेकर भी सक्रियता बढ़ा दी है। एक ओर भाजपा प्रदेश प्रभारी विजय रूपाणी के आने के इंतजार में हैं, वहीं आम आदमी पार्टी मोहाली विधायक कुलवंत सिंह के नेतृत्व में आगामी रणनीति तैयार करने में जुट गई है। क्यों दिल्ली हाईकमान भी अपने पदाधिकारियों से स्थानीय चुनावी माहौल को लेकर रिपोर्ट मांगेगी। उसके बाद स्थिति के अनुरूप अपने उम्मीदवारों के पत्ते खोलेगी। अभी तक कांग्रेस के सहयोग की अपेक्षा कर रही आप को पहले ही झटका लग चुका है, अब उसके सामने अपने पार्षदों को बचाना भी चुनौती है।
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सत्ता में रहकर भाजपा की पार्षद हीरा नेगी हार गईं थीं चुनाव
वर्ष 2017 में सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा की प्रत्यायी हीरा नेगी अपनी चुनाव हार गईं थीं। भाजपा के पास 21 पार्षद थे। दूसरी ओर कांग्रेस के मात्र 4 पार्षद होने के बावजूद देवेंद्र सिंह बबला चुनाव जीत गए थे। इसी तरह का कुछ माहौल वर्ष 2015 में देखने को मिला था। इस बार गुटबाजी हुई तो जीत का पलड़ा किसी भी ओर झुक सकता है।