अकाली दल ने एससी वर्ग की पार्टी कहे जानी वाली बहुजन समाज पार्टी से समझौता कर घोषणा की है कि पंजाब में डिप्टी सीएम की कुर्सी किसी अनुसूचित जाति के नेता को दी जाएगी। आम आदमी पार्टी के नेता भी कह चुके हैं कि पंजाब में डिप्टी सीएम एससी वर्ग से होगा।
राज्य में अनुसूचित जाति के वोटरों की तादाद 30 से 32 फीसदी (सबसे ज्यादा) के बीच में है लेकिन यह पूरी तरह कभी किसी पार्टी के साथ नहीं रहा। दलित वोट आमतौर पर कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के बीच बंटता रहा है। बीच में बीएसपी ने इसमें सेंध लगाने की कोशिश की लेकिन उसे भी एकतरफा समर्थन नहीं मिला। कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनावों में खासा समर्थन मिला था, जिसकी बिनाह पर कैप्टन की सरकार बनी।
पिछले चुनाव में अकाली दल तीसरे नंबर पर रहा था, जबकि 20 सीटों के साथ आम आदमी पार्टी दूसरे नंबर पर रही। अकाली-भाजपा गठबंधन को तब 18 सीटों पर संतोष करना पड़ा लेकिन अकाली दल को 30.74 तथा आप को 23.80 फीसदी मत ही मिले थे। कांग्रेस 38.64 फीसदी वोट ले सकी। कांग्रेस को डेढ़ फीसदी और अकाली दल को 11.20 फीसदी मतों का नुकसान हुआ था। पिछली बार आप ने अकाली दल के वोटों में सेंध लगाई, क्योंकि अकाली दल सत्ता में था लेकिन दलितों का झुकाव कांग्रेस व अकाली दल की तरफ था।
चन्नी को सीएम बनाकर कांग्रेस ने किसान आंदोलन में अपना रुतबा बरकरार रखने की भी कोशिश की है। पंजाब के गांवों में काफी आबादी मजहबी सिखों की है, जो किसानों के साथ मजदूरी करते हैं। मजहबी सिखों की आबादी का एक बड़ा तबका किसान मजदूर एकता के बैनर तले कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्ष कर रहा है।
कांग्रेस के दिग्गज शिअद-बसपा के समझौते से भी खासे परेशान चल रहे थे। पंजाब के एससी मतदाताओं का रुझान अकाली-बसपा की तरफ तेजी से बढ़ रहा था। अकाली दल और बीएसपी ने 1996 के लोकसभा चुनाव में भी गठबंधन किया था और तब पंजाब में इस गठबंधन को जोरदार सफलता मिली थी।
राज्य की 13 में से 11 लोकसभा सीटें इस गठबंधन ने झटकी थीं। अकाली दल को 8 और बीएसपी को 3 सीटें मिली थीं लेकिन उसके बाद अकाली दल ने बीजेपी के साथ हाथ मिला लिया और तब से यह गठबंधन 2020 तक चला था। 1996 की तरह 2022 में अकाली-बसपा पंजाब में तमाम राजनीतिक दलों का सफाया न कर दे, इससे पहले कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा कर बड़ी सियासी चाल चल दी है।