चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा के आर्किटेक्ट्स की बैठक
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पंजाब चैप्टर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्ट्स की तरफ से चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा के आर्किटेक्ट्स की बैठक आयोजित की गई। इसमें करीब 50 आर्किटेक्ट्स ने ‘व्हाट एल्स ट्राइसिटी’ पर चर्चा में हिस्सा लिया। आर्किटेक्ट्स ने इस बात पर जोर दिया कि चंडीगढ़ से संबंधित सभी फैसले राजनेताओं, नौकरशाहों की तरफ से किसी भी प्रोफेशनल की भूमिका या नागरिकों की भागीदारी के बिना ही अपने स्तर पर मनमर्जी से ले लिए जाते हैं। यह शहर के लिए बहुत खतरनाक है।
आर्किटेक्ट सुरिंदर बाहगा ने कहा कि ट्रिब्यून फ्लाईओवर का कॉन्सेप्ट जिस तरह से तैयार किया गया है, वह शहर की पहचान को बर्बाद कर देगा। जीएमसीएच-32 में शोर का स्तर बढ़ाएगा। ली कार्बूजिए सेंटर की निदेशक प्रोफेसर दीपिका गांधी ने शहर के विभिन्न कार्यों में युवा पीढ़ी को शामिल करने के लिए और सामान्य रूप से शहरीकरण के मुद्दों पर अधिक सक्रिय कदम उठाए जाने की जरूरत पर भी जोर दिया। पंजाब के पूर्व चीफ आर्किटेक्ट एसएस सेखों ने कहा कि वर्ष 1966 से पहले के चंडीगढ़ की स्थिति को बहाल किया जाना चाहिए।
चीफ इंजीनियर के बयान की आर्किटेक्ट्स ने की निंदा
आर्किटेक्ट्स ने चंडीगढ़ के चीफ इंजीनियर मुकेश आनंद के उस बयान की कड़ी निंदा की कि जिसमें उन्होंने कहा कि ली कार्बूजिए ने कंक्रीट का उपयोग करके एक बड़ी गलती की और चंडीगढ़ की बिल्डिंग्स को न्यूड छोड़ दिया। सभी ऐतिहासिक इमारतों का आर्किटेक्चर न्यूड हैं, या वे ब्रिक, स्टोन या कंक्रीट के आउटलुक में तैयार की गई हैं।
आर्किटेक्ट्स ने कहा कि मुकेश आनंद को लगता है कि इनकी मरम्मत करना मुश्किल है क्योंकि वे इसके लिए प्रशिक्षित नहीं हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि कार्बूजिए गलती कर रहे थे। यदि कैपिटल कांप्लेक्स के लिए कंक्रीट का उपयोग करना गलत था, तो चंडीगढ़ प्रशासन की प्रमुख परियोजनाएं अब भी एक ही मैटेरियल में क्यों बनाई जा रही हैं। उदाहरण के लिए जीएमसीएच-32, सेक्टर-42 में हॉकी स्टेडियम और वर्तमान में न्यू यूटी सचिवालय का निर्माण भी उसी तरह से किया गया है।