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चंडीगढ़ में सियासी उलटफेर: लगातार 2 बार की हार चलते से कटा बंसल का टिकट, कांग्रेस ने मनीष तिवारी पर लगाया दांव

Sun, 14 Apr 2024 09:16 AM IST
नवीन दलाल अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़

सार

लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की ओर से चंडीगढ़ संसदीय सीट के लिए बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। पार्टी ने वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन बंसल का टिकट काटकर मनीष तिवारी पर दांव लगाया है।
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पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी - फोटो : ANI
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विस्तार
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कांग्रेस ने शनिवार को बड़ा उलटफेर करते हुए चंडीगढ़ संसदीय सीट से पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी को मैदान में उतार दिया। वर्ष 1991 से अब तक इस सीट से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन बंसल चुनाव लड़ते रहे लेकिन इस बार पार्टी ने उनका टिकट काट दिया। पवन बंसल का टिकट कटने और मनीष तिवारी पर भरोसा जताने के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं।

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पहला कारण यह है कि बंसल लगातार दो लोकसभा चुनाव (वर्ष 2014 और 2019) हार चुके हैं। दोनों बार भाजपा की किरण खेर ने उन्हें हराया। ऐसे में कांग्रेस हाईकमान उन्हें तीसरी बार टिकट देकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था। मनीष तिवारी को चंडीगढ़ से उतारने का दूसरा प्रमुख कारण यह है कि कांग्रेस भी भाजपा की तरह प्रत्याशी बदलकर स्थानीय चेहरे पर ही भरोसा जताना चाहती थी, इसलिए तिवारी को टिकट दिया। बता दें कि भाजपा ने भी इस बार सांसद किरण खेर का टिकट काटकर उनकी जगह स्थानीय वरिष्ठ नेता संजय टंडन को मैदान में उतारा है।

मनीष तिवारी के पिता वीएन तिवारी पंजाब यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रह चुके हैं और मां अमृत तिवारी पीजीआई चंडीगढ़ में ओरल हेल्थ सेंटर में प्रोफेसर एवं प्रमुख रही थीं। यहां तक की ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले मनीष तिवारी के पिता की वर्ष 1984 में सेक्टर-24 में आतंकियों ने हत्या कर दी थी। तिवारी ने पंजाब विश्वविद्यालय से बीए की डिग्री हासिल की है और लंबे समय से चंडीगढ़ के मुद्दों पर संसद से लेकर चंडीगढ़ प्रशासन के समक्ष जनता की बात उठाते आए हैं। वह चंडीगढ़ के सेक्टर-4 में रहते हैं।
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तीसरा कारण है बंसल को लेकर पार्टी में असंतोष। बसंल वर्ष 1991 से लेकर पिछले चुनाव तक लगातार चंडीगढ़ सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे। किसी और को मौका नहीं मिलने से पार्टी के अंदर काफी असंतोष था। इस बार यह चर्चा काफी ज्यादा गर्म थी। कई मौकों पर बंसल के खिलाफ कुछ कार्यकर्ताओं का गुस्सा खुलकर सामने भी आया था। पार्टी के अंदर बदलाव की मांग हो रही थी, जिसे हाईकमान ने भी भांप लिया था। बताया जा रहा है कि चंडीगढ़ से टिकट के दावेदारों में शामिल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष एचएस लक्की ने भी बाद में केंद्रीय नेताओं को पत्र लिखकर मनीष तिवारी को टिकट देने की सिफारिश की थी। लक्की भी नहीं चाहते थे कि बंसल को टिकट मिले।

कई साल से चंडीगढ़ में सियासी जमीन तैयार कर रहे थे तिवारी

मनीष तिवारी चंडीगढ़ से लोकसभा का चुनाव लड़ने के इच्छुक थे। वह कई साल से अपने लिए यहां सियासी जमीन तैयार कर रहे थे। वर्ष 2022 की शुरुआत में जब चंडीगढ़ बिजली विभाग के निजीकरण की खबर आई तो तिवारी ने इसे लेकर संसद में सवाल उठाया। पूछा कि जब विभाग फायदे में है तो उसे बेचा क्यों जा रहा है।

फरवरी 2022 में जब शहर में अब तक का सबसे बड़ा ब्लैकआउट हुआ था तो तिवारी ने सांसद किरण खेर पर सवाल उठाते हुए गृहमंत्री से दखल की मांग की थी। कॉलोनी नंबर-4 को तोड़े जाने का भी उन्होंने विरोध जताया था। यही नहीं, तिवारी ने श्री आनंदपुर साहिब से सांसद होते हुए भी अपने एमपीलैड फंड से लाखों रुपये बापूधाम, धनास, मनीमाजरा में ओपन एयर जिम और कैमरे लगाने पर खर्च किए।

इंडिया गठबंधन में पूरी तरह फिट बैठे तिवारी

चंडीगढ़ सीट पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। तिवारी को टिकट मिलने के पीछे यह भी बड़ा कारण है कि वह गठबंधन के मानकों पर पूरी तरह फिट बैठ रहे थे। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़कर आप का दामन थाम चुके हैं। प्रदीप छाबड़ा और चंद्रमुखी शर्मा का नाम उनमें प्रमुख है। चंद्रमुखी शर्मा बेशक आप में शामिल हो गए हों लेकिन तिवारी से उनकी दोस्ती कभी कम नहीं हुई। ऐसे ही आप के कई अन्य नेताओं से मनीष तिवारी की अच्छी बनती है। ऐसे में आम आदमी पार्टी के नेताओं ने भी तिवारी को लेकर माहौल बनाया।

पेशे से वकील, गांवों और आबादी बाहुल्य क्षेत्र में अच्छी पकड़

मनीष तिवारी पेशे से वकील हैं। चंडीगढ़ में वकीलों का एक बड़ा समूह है और उनके बीच तिवारी की अच्छी पैठ है। इसके अलावा चंडीगढ़ के पुराने गांव जो आज सेक्टर का रूप ले चुके हैं, वहां भी उनकी अच्छी पकड़ है। शहर के प्रमुख क्षेत्र मनीमाजरा, रामदरबार, मलोया आदि इलाके इनमें शामिल हैं। तिवारी वर्ष 2012 से 2014 के बीच केंद्रीय मंत्री, वर्ष 2009 से 2014 तक लुधियाना से सांसद और मौजूदा आनंदपुर साहिब सीट से सांसद हैं। वह 1988 से 1993 के बीच एनएसयूआई के प्रेसिडेंट भी रहे।

खराब स्वास्थ्य के कारण लुधियाना से नहीं लड़ पाए थे चुनाव

मनीष तिवारी का जन्म 1965 में लुधियाना में हुआ था। वह 2004 का लोकसभा चुनाव हार गए थे, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने शिअद उम्मीदवार गुरचरण सिंह गालिब को 100,000 से अधिक मतों के अंतर से हराया। इसके बाद वह केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने। वर्ष वर्ष 2014 में मनीष तिवारी को लुधियाना लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना था, लेकिन तबीयत खराब होने के कारण उनको अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।

इस कारण उन्होंने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था। ऐसे में उनकी जगह पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू को कांग्रेस ने चुनाव मैदान में उतारा था। इसके बाद ही वर्ष 2019 में उन्होंने आनंदपुर साहिब सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। फिलहाल वह आनंदपुर साहिब के सांसद हैं।

यूपी-उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के भतीजे हैं मनीष तिवारी

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनीष तिवारी उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी के भतीजे हैं। एनडी तिवारी वर्ष 2002 से 2007 तक उत्तर प्रदेश के और उत्तराखंड के तीसरे मुख्यमंत्री रहे थे। वह पहले भारतीय मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने दो राज्यों में सेवाएं दी थीं। मनीष तिवारी का ताल्लुक मूलरूप से उत्तराखंड के जिला नैनीताल के बलूटी गांव से है। मनीष तिवारी का कांग्रेस से पुराना नाता रहा है।
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प्रतिक्रिया

पार्टी का फैसला मंजूर है। टिकट के लिए कोशिश सभी करते हैं। टिकट किसे देना है यह फैसला पार्टी करती है। पार्टी ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है। इस फैसले से खुश हूं। - पवन बंसल।

मनीष तिवारी साफ छवि वाले नेता हैं। चंडीगढ़ में जन्मे और यहीं पढ़े-लिखे हैं। उनका घर भी यहीं है और वह यहां सक्रिय भी रहे हैं। ऐसे में पार्टी का यह फैसला स्वागत योग्य है। मैंने उन्हें फोन कर बधाई दी है। चंडीगढ़ सीट पर कांग्रेस की जीत पक्की है। - एचएस लक्की, प्रदेश अध्यक्ष, कांग्रेस।
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