बहुचर्चित मानेसर जमीन घोटाला केस में हुड्डा समेत 34 के खिलाफ 400 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की गई, जिसने बिल्डरों में हड़कंप मचा दिया है। करीब 1500 करोड़ के घोटाले के आरोप में सीबीआई ने शुक्रवार को विशेष अदालत में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा सहित कुल 34 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की है। चार्जशीट फाइल करने के लिए निजी बिल्डरों के काले कारनामों से संबंधित दस्तावेजों से भरी अलमारी भी पंचकूला पहुंचाई गई। इस मामले में दस्तावेजों की जांच के बाद ही अगली सुनवाई 26 फरवरी को होगी।
मानेसर में जमीन अधिग्रहण मामले में धांधली के आरोप में सीबीआई ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हु्ड्डा, मुख्यमंत्री के तत्कालीन प्रधान सचिव एमएल तायल, तत्कालीन एडिशनल प्रिंसिपल सेक्रेटरी एवं यूपीएससी के पूर्व मेंबर छतर सिंह, तत्कालीन डायरेक्टर (टाउन एंड कंट्री प्लानिंग) एसएस ढिल्लों, डिस्ट्रिक्ट टाउन प्लानर(हेड क्वार्टर) जसवंत सिंह के अलावा रजोकरी स्थित एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट कंपनी के डायरेक्टर अतुल बंसल के अलावा 23 बिल्डरों और पांच अन्य कंपनियों के आला अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट फाइल की गई है।
बिल्डरों में हड़कंप
12 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रखते हुए सीबीआई को जांच रिपोर्ट सौंपने के लिए चार महीनों का वक्त दिया था। हरियाणा सरकार को भी कहा गया था कि वह एक हफ्ते के भीतर ढींगरा कमीशन की रिपोर्ट भी अदालत में सौंप दे। अब इसी दौरान सीबीआई ने पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत में चार्जशीट सौंप दी है। चार्जशीट की कॉपी सौंपने के बाद गुरुग्राम, दिल्ली और एनसीआर के अग्रणी बिल्डरों में भी हड़कंप मचा है।
चार्जशीट में इनका भी नाम
भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री हरियाणा
- फोटो : amar ujala
आदित्य बिल्डवेल (दिल्ली), जस्सुम एस्टेट्स(दिल्ली), जस्सुम टावर प्रा. लि.(दिल्ली), जस्सुम इंफ्रास्ट्रक्चर(दिल्ली), मेसर्र्स बीटा प्रमोटर्स (दिल्ली), दिव्य ज्योति इंटरप्राइजेज(दिल्ली), मेसर्र्स एनसीआर प्रॉपर्टीज प्रमोटर्स लि.(दिल्ली), मेसर्स इंडो एशियन कंस्ट्रक्शन(दिल्ली), मेसर्र्स डगमैन इंजीनियर्स प्रा. लिमिटेड(दिल्ली), मेसर्स गैलेक्सी कालोनाइजर्स(दिल्ली), माऊंट वैली एस्टेट्स, (दिल्ली), मिराज ओवरसीज प्रा. लिमिटेड (दिल्ली), मेसर्र्स यार्क्स होटल प्रा. लिमिटेड(दिल्ली), मेसर्र्स शील बिल्डॉन प्रा. लिमिटेड, मेसर्र्स प्रोगेसिव बिल्डटेक(दिल्ली), इकोटेक बिल्डकॉन(दिल्ली), दिल्ली की कंपनी कॉनवे डवलेपर्स के डायरेक्टर एके बतरा, नवीन राव(दिल्ली), गिरनार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रा. (दिल्ली) के डायरेक्टर रमेश चन्द्रा, गिरनार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. (गुरुग्राम), फ्लेयर रियलटर्स (दिल्ली) के विजय नागर, फ्लेयर रियलटर्स के डायरेक्टर गौरव चौधरी, मेसर्स मेट्रोपॉलिस के विजय नागर, अर्ल इंफोटेक के पदम सिंह, गुरुनानक इंफ्रास्ट्रक्चर, फगवाड़ा (पंजाब), एंजलीक इंटरनेशनल (दिल्ली), कॉनवे डेवलपर्स (दिल्ली), वीरेन्द्र कुमार जैन, रोहिणी(दिल्ली)
सीबीआई ने 2015 में मामले की शुरू की छानबीन
हुड्डा का कैप्टन का बड़ा बयान
- फोटो : File Photo
हरियाणा सरकार के आग्रह पर 12 अगस्त, 2015 में मानेसर थाने में आईपीसी की धारा 420, 465, 467, 471,, 468 के अलावा 120बी और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 के तहत मामला दर्ज किया था। इसके बाद सीबीआई ने 15 सितंबर 2015 को जांच शुरू की।
मामले में आरोप हैं कि गुरुग्राम के मानेसर में इंडस्ट्रियल मॉडल टाउनशिप (आईएमटी) स्थापना के नाम पर मानेसर, नौरंगपुर और लखनौला के 200 किसानों से औने-पौने दाम पर जमीनें खरीदी गई थीं। आरोप था कि हरियाणा सरकार की ओर से जमीन अधिग्रहण अधिनियम के तहत 27 अगस्त, 2004 को सेक्शन-चार, जबकि 25 अगस्त, 2005 को सेक्शन-छह के तहत अधिसूचना जारी की गई थी। इसके तहत आईएमटी के लिए मानेसर, नौरंगपुर और लखनौला गांव की 912 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की गईं।
यह भी आरोप है कि सेक्शन-4 लागू होने के बाद भी निजी बिल्डरों के साथ मिलकर हरियाणा सरकार के अधिकारियों ने भी किसानों से जमीन हड़पने की साजिश रची थी। बिल्डरों, अधिकारियों और सरकारी मुलाजिमों की मिलीभगत से तीनों गांवों की करीब 400 एकड़ जमीन औने-पौने भाव पर खरीद ली गईं। इसके लिए किसानों को अधिग्रहण का डर दिखाते हुए जमीनें ली गईं।
दो अलमारियों में बंद थे 80 हजार पेज के दस्तावेज
'भाजपा सरकार हर विभाग में फेल'
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जमीन अधिग्रहण से खौफजदा किसानों से औने-पौने दाम पर पुश्तैनी जमीनें खरीदने वाले बिल्डर, बिचौलिये, अधिकारियों के काले कारनामों का राज 80 हजार पन्नों में है। सीबीआई ने मानेसर जमीन घोटाले में विशेष अदालत में करीब 400 पन्नों की चार्जशीट सौंपी, उस वक्त साथ में निजी बिल्डरों के काले चिट्ठे भी दो अलमारियों में लाए गए। चार्जशीट में पूर्व सीएम भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, आईएएस सहित पूर्व अधिकारियों के अलावा 23 बिल्डरों की मिलीभगत की कारगुजारियां हैं।
शुक्रवार को सीबीआई की टीम अलमारी में बंद 80 हजार पन्नों के साथ पंचकूला पहुंची। इनमें तीन पूर्व आईएएस, डीटीपी, अधिकारी, 23 बिल्डरों के अलावा अन्य भी शामिल हैं। चार्जशीट में बिल्डरों पर फर्जी हस्ताक्षर करवाने के आरोपों से संबंधित साक्ष्य, भू-अधिग्रहण अधिनियम के सेक्शन-4, सेक्शन-6 लागू होने पर भी बिल्डरों को फायदा पहुंचाने के लिए अधिकारियों ने किस तरह नियमों की धज्जियां उड़ाई, इसका ब्यौरा सुरक्षित हैं।
इनमें कुछ ऐसे भी बिचौलिये हैं, जिनका नाम बिल्डरों के साथ जुड़ा रहा है। पूर्व सीएम भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के कार्यकाल के दौरान अधिकारियों ने किस तरह नियमों को दरकिनार करते हुए निजी बिल्डरों को फायदा पहुंचाया। किसानों की अनदेखी करते हुए उन्हें बदहाली तक पहुंचाने वाले जिम्मेवार अधिकारियों ने आखिरकार, घोटाले की रकम में से किस-किस को कितने का मुनाफा पहुंचाया। सभी पहलुओं से संबंधित साक्ष्य इन पन्नों में कैद हैं।
किसानों का दर्द छुपा है दस्तावेजों में
चार्जशीट की कॉपी की जांच के बाद इस मामले में होने वाली सुनवाई में आरोप भी तय किए जाएंगे। इस दौरान कुछ और आरोपियों के भी नाम का खुलासा हो सकता है, जिन्हें सप्लीमेंट्री चार्जशीट में शामिल किया जाएगा। 80 हजार पन्नों में एक-एक बिल्डर और अधिकारियों के काले कारनामे हैैं, जिन्होंने किसानों से न केवल आजीविका छीन ली, बल्कि उन्हें आर्थिक तंगी से जूझने के लिए भी मजबूर कर दिया।
किसानों के मिले प्रति एकड़ मात्र 25 लाख रुपये
सदन से अनुपस्थित रहे कांग्रेस विधायक दल
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2004-2007 के दौरान हुए अरबों के जमीन घोटाले के शिकार हुए किसानों ने 350 एकड़ जमीन महज 20-25 लाख रुपये प्रति एकड़ की कीमत पर मजबूरन बेच दी। जिन किसानों ने जमीनें नहीं बेचीं थी, उन पर भूमि अधिग्रहण अधिनियम के सेक्शन-9 के तहत अधिसूचना जारी कर दी गई। इसके बाद निजी बिल्डरों ने 50 एकड़ जमीन 1.5 करोड़ रुपये प्रति एकड़ की दर पर खरीद ली।
बाद में नियमों को दरकिनार करते हुए 24 अगस्त, 2007 को अधिग्रहीत जमीन किसानों की बजाय निजी बिल्डरों, दलालों और कंपनियों को दे दी गईं। उस वक्त जमीन की कीमत प्रति एकड़ चार करोड़ थी। यानी आईएमटी के लिए अधिग्रहीत करीब 400 एकड़ जमीन की कीमत 1600 करोड़ रुपये आंकी गई थी। यह पूरी जमीन किसानों से महज 100 करोड़ रुपये में ले ली गईं। माना जा रहा है कि तीनों गांवों में वास्तविक भू-स्वामियों को करीब 1500 करोड़ का नुकसान पहुंचा था।
नियमों को ताक पर रखकर जारी किए सीएलयू और लाइसेंस
जांच में यह भी सामने आया कि किसानों को जमीन के अधिग्रहण के नाम पर डराया गया ताकि औने पौने दाम पर उनसे जमीन खरीदी जा सके। इसी साजिश के तहत अधिकारियों, निजी बिल्डरों की मिलीभगत से जमीन के नाम पर घोटाला किया गया। ग्रुप हाउसिंग सोसायटी के लाइसेंस के लिए भी टाउन एंड कंट्री प्लानिंग को कई आवेदन किए गए थे, जिन्हें सेक्शन-चार के बाद भी लाइसेंस जारी कर दिए गए।
जांच में यह भी खुलासा हुआ कि बिल्डरों ने कुछ किसानों की जमीन हथियाने के लिए उनके फर्जी हस्ताक्षर भी किए और उसी निजी बिल्डर को ग्रुप हाऊसिंग प्रोजेक्ट्स के लिए 260 एकड़ जमीन के लिए लाइसेंस और सीएलयू भी जारी किया गया। एक बिल्डर को 13 एकड़ जमीन में नए प्रोजेक्ट के लिए किसानों की जमीन दी गई, जिसे कंपनी ने आगे बेचकर 78 करोड़ रुपये की कमाई की।