दूसरे देशों में जाकर बसे लोगों के जीवन पर रिसर्च करना आसान नहीं है। उनसे जुड़ी न तो कोई किताबें मिलती हैं और न ही कोई अन्य साहित्य। यही दिक्कत पंजाब यूनिवर्सिटी के सोशियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर विनोद कुमार चौधरी ने डायसपोरा पर रिसर्च करते समय झेली। ऐसी दिक्कतों से स्टूडेंट्स को दो चार न होना पड़े इसके लिए उन्होंने एक नॉलेज पूल बना दिया है। उन्होंने एक पोर्टल पर पूरा साहित्य अपलोड किया है।
इसका सकारात्मक परिणाम सामने आया और इस पोर्टल से अब तक 40 देशों से अधिक के शिक्षक व रिसर्च स्कॉलर जुड़ गए हैं। वर्ष 2011 में प्रोफेसर विनोद कुमार चौधरी इंडियन डायसपोरा इन थाईलैंड विषय पर रिसर्च कर रहे थे। भारत से जाकर थाईलैंड में बसे लोगों से जुड़ा कोई भी साहित्य उन्हें नहीं मिला। वहां की लाइब्रेरी भी खोजा। तमाम लोगों से संपर्क भी साधा, लेकिन अधिक जानकारी इकट्ठी नहीं हो पाई।
सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक व आर्थिक हिस्सेदारी के बारे में उन्हें अधिक पता नहीं लगा तो उस पर ही काम करना शुरू कर दिया। विदेशों में तैनात राजदूतों से भी कुछ जानकारी हासिल की। उसके बाद अपने रिसर्च के साथ साथ उन्होंने इग्नू के प्रोफेसर डॉ. सदानंद साहू व जेएनयू के प्रोफेसर श्रीनिवास से संपर्क साधा। उसी दौरान एक पोर्टल तैयार किया।
इसका नाम डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट जीआरएफडीटी डॉट कॉम तैयार किया। जैसे ही पोर्टल शुरू हुआ तो दुनियाभर के शिक्षक व रिसर्च स्कॉलर इससे जुड़ गए। यूरोप के अलावा गुवाना, मॉरीशस, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, रसिया आदि देशों के रिसर्च स्कॉलर भी ऐसा ही साहित्य ढूंढते मिले। उन्हें भी डायसपोरा पर रिसर्च करना था।
सभी रिसर्च स्कॉलर ने अपने अपने देशों की जानकारी उपलब्ध कराई ताकि रिसर्च स्कॉलर की मदद हो सके। यह कारवां बढ़ता गया और आज इस पोर्टल से 3000 से अधिक रिसर्च स्कॉलर जानकारियां हासिल कर अपनी पीएचडी पूरी कर रहे हैं। प्रो. विनोद कुमार चौधरी कहते हैं कि अब हर साल दो इंटरनेशनल सेमिनार डायसपोरा पर ही आयोजित करते हैं ताकि सभी रिसर्च स्कॉलर की और मदद हो सके। दुनियाभर से शिक्षक व रिसर्च स्कॉलर दिल्ली में होने वाले कार्यक्रम में पहुंच रहे हैं।
क्या है डायसपोरा
डायसपोरा का अर्थ है कि किसी देश के नागरिक दूसरे देश में जाकर बस जाते हैं तो उनके जीवन में परिवर्तन आता है। साथ ही उस देश के लिए उनका योगदान आदि पर भी कार्य होता है।