मिलर को 1808 मीट्रिक टन कस्टम मिल्ड राइस (सीएमआर) एफसीआई को देना था, उसमें से भी 1318 मीट्रिक टन ही दिया। लगभग डेढ़ करोड़ रुपये मूल्य के 480 मीट्रिक टन चावल की एफसीआई को आपूर्ति नहीं की। मामला जब पकड़ में आया तो सितंबर 2018 में किए गए भौतिक सत्यापन में मिल परिसर बंद पाया गया और धान भी उपलब्ध नहीं था।
जिला मिलिंग समिति ने मिलर्स के खिलाफ इसके लिए तुरंत एफआईआर दर्ज नहीं कराई। कृषि उद्योग निगम ने कैग को बताया है कि मिलर और गारंटरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा रही है और मध्यस्थता की कार्रवाई भी कर रहे हैं। निगम के इस जवाब से कैग संतुष्ट नहीं हुआ।
महालेखाकार लेखापरीक्षा फैसल इमाम ने की सिफारिश
महालेखाकार लेखापरीक्षा हरियाणा फैसल इमाम ने कस्टम मिल्ड राइस के दुरुपयोग पर अहम सिफारिश की है। उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि कृषि उद्योग निगम लिमिटेड को नियमित रूप से मिलों में स्टॉक का भौतिक सत्यापन करना चाहिए। साथ ही उन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करें जिन्होंने गैर अनुमोदित मिलर को धान का स्टॉक आवंटित कर दिया। इसके अलावा कृषि उद्योग निगम व राज्य भंडारण निगम अपने अधीन आने वाले केंद्रों में यह जांच कराएं कि एफसीआई से ब्याज की राशि लेने के लिए देरी से दावा करने पर कितने राजस्व की चपत लगी है। साथ इससे बचने के लिए संस्थागत तंत्र स्थापित करें।
इन वजह से भी हुई वित्तीय हानि
राज्य सड़क एवं पुल विकास निगम ने अग्रिम आयकर जमा नहीं किया और आयकर रिटर्न दाखिल करने में देरी की। इससे नौ करोड़ के ब्याज का भुगतान करना पड़ा। इससे निगम बच सकता था। निगम ने अपनी निधियों को अधिकतम ब्याज दरों पर निवेश भी नहीं किया, इससे 40 लाख रुपये के ब्याज की चपत लगी। कृषि उद्योग निगम व राज्य भंडारण निगम ने खरीफ विपणन सीजन 2017-18 के दौरान भारतीय खाद्य निगम से कस्टम मिल्ड राइस का ब्याज मांगने में देरी की, जिससे दोनों निगमों को एक करोड़ का टाला जा सकने वाला ब्याज देना पड़ा।