वैश्विक मंच पर हिंदी तेजी से आगे बढ़ी है। 150 से अधिक देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी के विभाग संचालित हैं। लगातार इसका प्रचार-प्रसार हो रहा है। प्रवासी भारतीय भी हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन हिंदी अभी तक संयुक्त राष्ट्र की भाषा नहीं बन सकी। इसका एक बड़ा कारण यह रहा कि अपने ही देश में यह पूरी तरह लागू नहीं हो सकी। इसके प्रति लोगों की मानसिकता नहीं बदली। हिंदी व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में इसी मानसिकता के कारण भेदभाव होता रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के लिए हिंदी के प्रति अपने लोगों को मानसिकता में बदलाव करना होगा। क्षेत्रीय भाषाओं से प्रेम करना होगा। ये बातें अमर उजाला के संवाद में निकलकर सामने आईं। विशेषज्ञों ने वैश्विक मंच पर हिंदी की पहुंच विषय पर कहा कि जिस तरह पीएम नरेंद्र मोदी ने विदेशों में जाकर हिंदी में बात करने को प्राथमिकता दी, उसी तरह हमें भी हिंदी से प्रेम करना चाहिए। विदेशों में हिंदी के सचिवालय खोलने से हिंदी विश्व पटल पर और तेजी से आगे बढ़ी। वहीं अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति हिंदी को और आगे ले जाने का काम करेगी।
दूसरी भाषाओं से भी करना होगा प्रेम
विश्व पटल पर हिंदी का निरंतर विकास हो रहा है। कुछ वर्षों में हिंदी तेजी से आगे बढ़ रही है। पीएम नरेंद्र मोदी हों या फिर स्व. सुषमा स्वराज। उन्होंने हिंदी को आगे ले जाने का कार्य किया। हिंदी का विकास तेजी से तभी हो पाएगा, जब हम दूसरी भाषाओं से भी प्रेम करेंगे। इससे हम प्रादेशिक भाषाओं का विश्वास जीत पाएंगे। जिस तरह कोरियन व चाइनीज भाषाएं सीखने के लिए वहां की सरकारें छात्रवृत्ति देती हैं, उसी तरह यहां भी पहल करनी होगी।
-डॉ. गुरमीत सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग पीयू
हिंदी सीखने के लिए विदेशी आ रहे आगे
हिंदी आगे बढ़ रही है, लेकिन इसके प्रति लोगों की मानसिकता में अधिक अंतर नहीं आ रहा है। सोच हिंदी के प्रति बेहतर करनी होगी। जब देश में हिंदी पूरी तरह मजबूती से लागू हो जाएगी तो इसे विश्व की भाषा बनाने में और आसानी होगी। विदेशी तेजी से हिंदी सीख रहे हैं, लेकिन अपने यहां हिंदी सीखने वालों की तादाद कम है। कनाडा व अन्य देशों में हिंदी व पंजाबी में बोर्ड लगाए गए हैं। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि हिंदी का विकास विदेशों में भी हो रहा है।
-डॉ. अंजू बहल, वरिष्ठ अनुवादक, भारतीय मानक ब्यूरो
हिंदी के प्रति बदलाव लाने की जरूरत
लोगों की सोच यह बन गई कि अंग्रेजी से ही उन्नति है हिंदी से नहीं। इस सोच में बदलाव लाने की जरूरत है। मॉरिशस में 65 फीसदी भारतीय हैं। वहां हिंदी तेजी से आगे बढ़ी। यहां से जाने वाले लोगों ने हिंदी को आगे बढ़ाया। केंद्र सरकार ने इसी को लेकर हिंदी सचिवालय की स्थापना भी की। विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग स्थापित होने से लग रहा है कि हिंदी भाषा अपना प्रभाव छोड़ रही है।
-डॉ. मोहनलाल जाट, विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, जीसीजी सेक्टर-11
हिंदी को सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़ना होगा
हिंदी के विकास में मानसिकता बाधा बनी हुई है। इस बाधा को पार कर लेंगे तो हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बन जाएगी। हमें बच्चों को घर में गाय को गाय ही बोलना सिखाना होगा, न कि काऊ। हिंदी के पाठ्यक्रम को मजबूत करना होगा। भाषा जब पाठ्यक्रम में आएगी तो निश्चित रूप से वह आगे बढ़ेगी। भाषा को आगे ले जाने के लिए नए प्रयोग करने चाहिए, उसके लिए हिचकें नहीं। साथ ही इसे सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़ना होगा। अब हिंदी के विकास में नई शिक्षा नीति कुछ भूमिका अदा करेगी।
-डॉ. हेमलता, राजभाषा अधिकारी, यूको बैंक
कला के जरिए हिंदी का प्रचार हो रहा
हिंदी की तुलना अंग्रेजी या अन्य भाषाओं से करने की आवश्यकता नहीं है। जब हम तुलना करते हैं तो उसमें हम भाषाओं को ऊंचा, नीचा दिखाते है। यह एक पाप है। नाटक, कहानी, फिल्मों के जरिए कलाकार हिंदी का प्रचार-प्रसार बेहतर कर रहा है। विदेशी लोग बेहतर अभिनय के कारण हिंदी फिल्मों को देख रहे हैं। कला से हिंदी का प्रचार-प्रसार और हो सकता है। थिएटर के जरिए लोगों को हिंदी के वे शब्द बता रहे हैं जो लोगों के जेहन में नहीं हैं।
-चक्रेश, फिल्म निर्माता व निदेशक, अलंकार थिएटर
प्रवासी भारतीयों से हिंदी आगे बढ़ रही
हिंदी तेजी से विश्वभाषा बनने की ओर अग्रसर है। इसका प्रचार-प्रसार करने में प्रवासी भारतीय अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। विदेशों के शिक्षण संस्थानों में हिंदी पढ़ने वालों के बढ़ते आंकड़े बता रहे हैं कि हिंदी विश्व की तीसरी नहीं, पहली भाषा बनेगी। मॉरिशस हो या फिर आस्ट्रेलिया, यूएसए, इन सभी देशों में हिंदी के जानकार बढ़ रहे हैं। कोचिंग संस्थान वहां खुल रहे हैं। विश्व के मंच पर यह भाषा छा गई है।
-सुमित कुमार, शोधार्थी, हिंदी विभाग पीयू
अनुवाद से बढ़ा हिंदी का दायरा
अनुवाद के जरिए हिंदी की पहुंच अब दूर-दूर तक हो गई है। विदेशों में अनुवादक रखे जा रहे हैं। विदेशी भाषाओं का अनुवाद हिंदी में हो रहा है। इसका बाजार भी बड़ा हो रहा है। इस कारण कंपनियां भी लोगों की जरूरतों के मुताबिक उत्पादों को हिंदी में प्रस्तुत कर रही हैं। विदेशों में जिस तेजी से हिंदी बढ़ रही है, उतनी तेजी यहां नहीं दिख रही। इसमें मानसिकता आड़े आ रही है। इसी सोच को बदलना होगा।
-अलका कल्याण, शोधार्थी, हिंदी विभाग पीयू
अनुवाद को मौलिक लेखन से जोड़ना होगा
युवाओं को हिंदी से जोड़ने के लिए पुरस्कार की घोषणा की गई है। हिंदी के विकास के लिए हरियाणा साहित्य अकादमी देश में सबसे बड़ा पुरस्कार देती है। हिंदी का विकास कई माध्यमों से हो रहा है लेकिन इसके लिए समृद्ध साहित्य तैयार करना होगा। अनुवाद को मौलिक लेखन से जोड़ना होगा। उसी के मुताबिक विशेषज्ञ रखने होंगे। यह भाषा जितनी सरल होगी उतना ही लोग तेजी से अपनाएंगे। मीडिया का हिंदी के विकास में अहम रोल है। शब्दों का चयन ऐसे करें जो आमजन भी समझ सके। -
डॉ. विजेंद्र कुमार, भाषा संपादक, हरियाणा साहित्य अकादमी
विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी के विद्यार्थी बढ़ रहे
हिंदी की स्थिति देश ही नहीं विदेशों में भी अच्छी है। हम विद्यार्थियों को हिंदी सिखा रहे हैं और उनमें जिज्ञासा भी है। हिंदी हो या फिर अन्य भाषाएं, सभी को जानना चाहिए। विश्व पटल की बात करें तो अमेरिका, कनाडा, मॉरिशस समेत कई देशों में हिंदी प्रेमी बढ़ रहे हैं। वहां के विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग खुल रहे हैं। विद्यार्थी हिंदी सीखने के लिए आगे आ रहे हैं। हिंदी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए हम खुश हैं, लेकिन इसके प्रभाव को आगे बढ़ाने के लिए और प्रयास करने होंगे।
-डॉ. हरप्रीत कौर, हिंदी विभाग, जीसीजी कॉलेज सेक्टर-42