तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के साल भर चले आंदोलन के कारण पंजाब में अब भाजपा अपनी पुरानी साख तलाशने को मजबूर है। साल भर पार्टी के नेताओं को जहां राज्य में लोगों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा वहीं किसान आंदोलन के चलते पार्टी को अपना 24 साल पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल (शिअद) का साथ भी गंवाना पड़ा। अब पंजाब भाजपा ने सूबे की सभी 117 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने का एलान तो कर दिया है लेकिन बीते एक साल के दौरान खिसके जनाधार को फिर से उभारने में पार्टी को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है।
भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की नई पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस और शिअद से अलग हुए सीनियर टकसाली नेताओं के संयुक्त अकाली दल के साथ चुनावी गठबंधन की कवायद भी शुरू कर दी है। कैप्टन से भाजपा नेताओं की कई दौर की बातचीत भी हो चुकी है और कैप्टन खुद भी इस गठबंधन के लिए उत्साहित हैं। दूसरी ओर, संयुक्त अकाली दल की कमान संभाल रहे सीनियर अकाली नेता सुखदेव सिंह ढींढसा ने अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
उन्होंने भाजपा नेता व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ इस संबंध में बैठक होने की बात तो कही है लेकिन कोई अंतिम फैसला होने के बारे में चुप्पी साधे हुए हैं। भाजपा कैप्टन से ज्यादा अकाली नेताओं को महत्व दे रही है। पार्टी शिअद के बागी अकालियों को साथ लेकर एक बार फिर जाट सिख वोटरों तक पहुंच बनाना चाह रही है जबकि कैप्टन के साथ गठबंधन में उसे फिलहाल कोई बड़ा लाभ होता दिखाई नहीं दे रहा। प्रदेश में जट सिख वोटरों की तादाद 18 फीसदी से ज्यादा है और अगर बेअदबी व कोटकपूरा का मामला गरमाया रहा तो अकाली दल बादल के लिए मुश्किलें खड़ी होना तय है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीनों विवादित कानून वापस लिए जाने के बाद भले ही भाजपा पंजाब चुनाव में इसका लाभ मिलने की उम्मीद लगा रही है लेकिन जमीनी हालात अभी तक पार्टी के खिलाफ ही दिखाई दे रहे हैं। किसान नेता जगमोहन सिंह ने कहा कि एक साल तक किसानों के साथ उनके परिवारों ने भी बहुत तकलीफें झेली हैं। किसान अपने परिवारों सहित क्रमवार दिल्ली बार्डर पर आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए डटे रहे। उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन के दौरान शहीद हुए किसानों में पंजाब के किसानों की संख्या सबसे ज्यादा है। सूबे से ग्रामीण ही नहीं, शहरी भी यह बात भूले नहीं हैं। उन्होंने कहा कि किसान किसी भी कीमत पर भाजपा के साथ नहीं जुड़ेगा और भाजपा के साथ देने वालों को भी सबक सिखाया जाएगा।
भाजपा की गठबंधन की पेशकश को लेकर शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त) के प्रमुख नेताओं जत्थेदार रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा और प्रधान सुखदेव सिंह ढींढसा ने अब तक पत्ते नहीं खोले हैं। हालांकि बीते सोमवार को ही उनकी पार्टी ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करके आगामी विधानसभा चुनाव के लिए रणनीति तय करने की जिम्मेदारी सुखदेव सिंह ढींढसा को सौंप दी है। इससे पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ढींढसा से मिलकर गठबंधन के बारे में विचार विमर्श किया था। तब ढींढसा भी कैप्टन की पार्टी से जुड़ने को तैयार थे लेकिन जैसे ही कैप्टन ने भाजपा से गठबंधन करने का एलान किया, ढींढसा ने कैप्टन के साथ गठजोड़ से इनकार कर दिया था। देखना यह होगा कि ढींढसा के नेतृत्व में पुराने टकसाली नेता भाजपा का साथ देने को तैयार होंगे या नहीं। फिलहाल वे अकाली दल बादल से अलग होकर खुद को बेअदबी के आरोपों से निकालने की कोशिशों में जुटे हैं।