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ऐसा तालाब, जहां खिलते थे फूल अब मुरझा जाएं गुलाब

Sun, 27 Jul 2014 09:59 AM IST
राजकुमार भारद्वाज/अमर उजाला, चरखी दादरी
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भाईसाहब, श्यामसर तालाब किधर है? जवाब में ऑटो स्पेयर पार्ट्स की दुकान पर खड़े दादरी के राजेश ने कहा, सर इब वो तालाब नहाणे जोगा कोनी रह्या, मंदर में धौक मारणी हो तो अलग बात सै। समृद्ध जल परंपरा वाले हरियाणा में जिस तरह ऐतिहासिक तालाबों ने दम तोड़ा है, उनमें से सबसे अधिक दर्दभरी कहानी चरखी दादरी के श्यामसर तालाब की।
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कस्बे के एकदम बीच स्थित इस तालाब पर हम नहाने की उम्मीद से गए भी नहीं थे। लेकिन सेठों-साहूकारों के दादरी का तीर्थस्थल श्यामसर अब कूड़ाघर होगा इसकी हमें तनिक भी आशंका नहीं थी। यह इसलिए भी नहीं कि श्यामसर के चारों तरफ मंदिर और आठ कुएं हैं।

फोगाट गोत्र के जाटों के 12 और उनके भाईचारे के सात गांव आज भी अपने दुधारू पशु का दूध या दही सबसे पहले यहां चढ़ाते हैं। ऐसी मान्यता है कि जिसने भी इसका पालन नहीं किया, उसका पशु दूध नहीं देता। यहां भारतीय कैलेंडर के हिसाब से बारहों मास मेले लगते हैं।
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गूगा, हनुमान और बाबा स्वामीदयाल के मेलों में एक लाख से अधिक लोग जुटते हैं। लेकिन श्यामसर तालाब में अब कई टन कचरा पड़ा है। आने वाले धौंक मारकर मुंह फेरकर चले जाते हैं। तकरीबन 40 फुट गहरे इस तालाब में 25 फुट तक सड़ांध मारता पानी खड़ा है। रिंपी फोगाट बताते हैं, शहर के कई मोहल्लों की नालियों का कचरा अब सीधा इस तालाब में गिरता है।

नगर पालिका ने भी कई सीवर पाइपों का मुंह श्यामसर में कर रखा है। हर घाट पर 101 पेड़ियों के साथ बने स्थापत्य कला के इस अत्यंत सुंदर तालाब के चारों घाट अब तेजी से खत्म हो रहे हैं। गऊ घाट, घोबी घाट, झरना घाट और झंडा घाट हैं। गऊ घाट पर गायों के आने के लिए सीधा रास्ता बना है। हर घाट आधा एकड़ में बना है जबकि ढाई एकड़ में पानी खड़ा है। इसके तीन हिस्सों में 9 से 12 इंच का चूने का फर्श है।

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तालाब कभी हमारी जिंदगी में रचे बसे थे। पीने के पानी से लेकर आस्था की डुबकी लगाने तक। हम इन्हें पूजते थे लेेकिन समय बदला। हम तालाबों को भूल गए और इन्हें पूजने के बजाय इनका वजूद मिटाने में लग गए। ऐसे ही भूले बिसरे तालाबों पर हम यह सीरीज शुरू कर रहे हैं ताकि तालाब फिर जिंदा हों और हमारे लिए जीवनदायी बनें।

यह है चरखी दादरी का ऐतिहासिक तालाब
श्यामसर का इतिहास कितना पुराना है, इसका कोई प्रामणिक रिकार्ड नहीं हैं। श्यामसर तालाब के निकट रहने वाले 60 साल के हरिसिंह के मुताबिक, उनके दादा बताते थे, इस तालाब का इतिहास भी उतना ही पुराना है जितना कि यहां फोगाट गोत्र के जाटों के बसने का।

तालाब का निर्माण दिल्ली का सीताराम बाजार बनाने वाले लाला सीताराम ने किया था। वह दादरी के रहने वाले थे। लालकिले के निर्माण कार्य में मजदूरी करने गए सीताराम अपनी ईमानदारी और मेहनत के चलते मुगल बादशाह का खजांची बन गए थे।

आठ कुओं में से सिर्फ एक बचा
इसकी चहारदीवारी अब धीरे-धीरे खत्म होने लगी है। दीवारें इतनी चौड़ी हैं कि इन पर मारुति कार दौड़ सकती है। इसकी दीवारों में कलियाणा पहाड़ का नीला और कई जगह भूरे रंग का पत्थर लगा है। इसके चारों ओर बने आठ कुओं में से सात जवाब दे चुके हैं। एकमात्र अनुसूचित जनजाति की ग्वारिया बस्ती के सामने वाला कुआं बचा है।

तालाब के चारों ओर स्थित मंदिरों के भीतर बने चार कुओं में से तीन का पता ही नहीं। परशुराम ब्राह्मण भवन में एक कुआं भवन के रूप में ज्यों का त्यों हैं। इसके पानी का बड़ा हिस्सा तकरीबन 7-8 किलोमीटर दूर कलियाणा पहाड़ से आता था।

बुजुर्ग रणधीर सिंह बताते हैं कि पहाड़ के ऊपर से आने वाले पानी में देसी जड़ी-बूटियों का रस घुला होता था। इसीलिए यहां का पानी बहुत सारी बीमारियों का इलाज भी करता था।
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