अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान के तहत पाठकों के लिए शुरू किए गए ‘आओ हिंदी में लिखें’ कार्यक्रम के पहले दिन बड़ी संख्या में पाठकों की रचनाएं ईमेल के जरिए हमें प्राप्त हुईं। कुछ पाठकों ने कविताएं लिखकर तो कुछ ने अपने विचारों के जरिए हिंदी भाषा से अपने प्रेम का इजहार किया। प्राप्त ईमेल में से कुछ चुनिंदा रचनाओं को प्रकाशित किया जा रहा है। पाठक अपनी रचनाएं हमें 14 सितंबर तक भेज सकते हैं। कोशिश करें कि अपनी स्वलिखित रचनाएं ही भेजें।
दैनिक व्यवहार में हिंदी में कार्य करने में कैसा संकोच
सर्वविदित है कि 14 सितंबर को हिंदी दिवस है। सरकारी कार्यालयों में उत्सव जैसा माहौल है, क्योंकि इन कार्यालयों में सितंबर में हिंदी माह, हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़ा मनाया जाता है। आपके विचार में क्या ऐसी मानसिकता सही है? क्या हिंदी का प्रयोग केवल सितंबर माह में ही किया जाना चाहिए? दैनिक व्यवहार में हिंदी में कार्य करने में संकोच कैसा? आज स्कूल के विद्यार्थियों को सरल शब्दों की वर्तनी भी नहीं आती। हिंदी विशेषज्ञों की मदद से समय-समय पर कार्यशालाएं आयोजित की जा सकती हैं। यदि हम हिंदी को वास्तविक रूप में विकसित करना चाहते हैं तो अनुवाद के स्थान पर मूल कार्य हिंदी में करने पर बल देना चाहिए।
- अंजू बहल, अनुवादक, सेक्टर-48 आशियाना सोसाइटी चंडीगढ़
मां... तुम शब्द नहीं.. संसार हो
तुम शब्द नहीं.. संसार हो, इस सृष्टि का आधार हो
तुम जग जननी, तुम शक्ति रूपा, तुम अलौकिक अपरंपार हो मां
तुम शब्द नहीं.. संसार हो, तुम ममता का सागर
तुम वत्सल की देवी हो, तुम्हारी कोख से जन्म मिले
ऐसा बारंबार हो मां, तुम शब्द नहीं.. संसार हो
तुम आदि हो अनंत हो, धूप-छांव-बसंत हो
तुम निर्मल कोमल काया रूपी, देवी का अवतार हो मां
तुम शब्द नहीं.. संसार हो।
- प्रदीप मेहरा, लेखक एवं चित्रकार, चंडीगढ़
मां का अनमोल प्यार
है वो प्यारी, है वो निराली, है वो सबसे बढ़कर
करती है वो हमको प्यार अपने से भी बढ़कर
सुबह वो सूरज चढ़ने से पहले उठे
और रात हम सबको सुलाकर सोए
हम भूखे हों तो अपना खाना भी हमको दे दे
मुझे चोट लगे, मुझसे पहले वो रो दे
मेरे कुछ ना कहने पर भी, मेरी सब बात समझ जाए
जरा सा अगर मैं रूठ जाऊं, मुझे मनाने के लिए सब काम छोड़ दे
मां का प्यार अनमोल है, दुनिया में इतना इतना अनमोल प्यार
मां के अलावा और कौन करता है
- अनमोल शर्मा, सेक्टर 47सी चंडीगढ़
मैं कहां का हूं
मेरे से कभी मत पूछना की मैं कहां का हूं। मैं कहीं का भी नहीं हूं
मेरा पता जानना है तो चलती ट्रेन में आ जाना, किसी खिड़की के साथ बैठा मिल जाऊंगा
मैं वही का हूं। मेरा इस दुनिया से नाता नहीं है। मेरा नाता मेरी जानेमन, मेरी मां से है।
मैं उसी का हूं। चलो फिर भी ढूंढना चाहो तो हवा को देख लेना, दिख जाऊं तो
मैं हवा का हूं। कभी अपनी सांसों को थमने मत देना। मैं इल्म तुम्हारी सांसों का हूं
अगर पढ़ोगे कभी ये किताब अपने दिल से, तो मैं इन्हीं किताबों का हूं ,
ढूंढ लेना अगर तो भी, मत पूछना की मैं कहां का हूं
- दीपक झा, आर्टिस्ट, दड़वा चंडीगढ़