जीत का जश्न मनाते आप कार्यकर्ता।
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चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव में जनता ने किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया है। अब मेयर बनाने के लिए जोड़तोड़ की राजनीति शुरू होगी। बहुमत का आंकड़ा बेशक 19 का हो लेकिन यह महज कागजों तक सीमित है। अपना मेयर बनाने के लिए तीनों पार्टियां अब पूरा प्रयास करेंगी। वहीं, तीनों पार्टियों को अपने-अपने पार्षदों को बचाना भी एक बड़ी चुनौती है।
खासकर भाजपा और आप का कोई भी पार्षद टूटकर दूसरी पार्टी में गया तो उसी का पलड़ा भारी होगा। निगम चुनाव में दल बदल विरोधी कानून लागू न होने से अब तीनों पार्टियों के पास यही एकमात्र विकल्प बचा है। त्रिकोणीय मुकाबले ने नगर निगम चुनाव को और रोमांचक बना दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि मेयर की कुर्सी पर कौन कब्जा जमाएगा।
आप 14 सीटें जीतकर बड़ी पार्टी तो बन गई लेकिन मेयर बनाने के लिए उसे अभी भी कुछ प्रत्याशियों को अपने साथ जोड़ना होगा। वहीं, भाजपा को 12 सीटें मिली हैं। एक वोट सांसद का मिलने से यह संख्या 13 हो जाएगी। भाजपा कांग्रेस या आप में से कुछ पार्षदों को तोड़ने में कामयाब रही तो मेयर बनाने में वह भी सफल हो सकती है। इस पूरे मामले में कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। जिसकी ओर कांग्रेस जाएगी, वह आसानी से अपना मेयर बना लेगा। वहीं, एक मत अकाली दल का भी है। ऐसे में एक दूसरे के पार्षदों को तोड़ने के लिए भाजपा और आप पूरा जोर लगाएंगी, वहीं कांग्रेस मौके का फायदा कैसी उठाएगी और किसके पक्ष में जाएगी यह काफी रोमांचकारी होगा।
पंजाब को देखकर तय होगा कांग्रेस के साथ गठबंधन
भाजपा और अकाली दल का गठबंधन कुछ दिन पहले ही टूटा है। केंद्र और पंजाब में दोनों दलों के बीच काफी मनमुटाव है। ऐसे में भाजपा-अकाली का गठबंधन मुश्किल है। पंजाब में आप हमेशा कांग्रेस पर हमलावर रहती है। यहां गठबंधन हुआ तो फिर पंजाब की सियासी पिच पर आप का प्रदर्शन गिर जाएगा। भाजपा और कांग्रेस का गठबंधन भी न के बराबर है। ऐसे में पार्षदों को तोड़ने के अलावा विपक्षी पार्टियों के पास कोई विकल्प नहीं होगा।