प्रस्ताव में केंद्र सरकार को याद दिलाया गया कि एपीएमसी एक्ट की संवैधानिक वैधता है। यह राज्य के कानून हैं, जो इस धारणा के अधीन बनाए गए हैं कि कृषि और कृषि मंडीकरण राज्य का विषय है। एक्ट के अधीन स्थापित की गई नियमित मंडियों की एक कानूनी बुनियाद, बुनियादी ढांचा और एक व्यापारी या सरकारी खरीद एजेंसी द्वारा की गई हर खरीद को दस्तावेजी रूप देने के लिए एक अच्छी परिभाषित विधि है।
दूसरी तरफ गैर-नियमित मंडियां बिना किसी बुनियादी ढांचे, बिना किसी संस्थागत सहायता और बिना किसी जवाबदेही के फर्जी व्यापारिक केंद्रों के समान हैं। इस प्रस्ताव पर बहस के दौरान किसान हितैषी नियमित मंडियों (एपीएमसी मंडियों) को योजनाबद्ध ढंग से खत्म कर व्यापारी समर्थक गैर-नियमित मंडियों में बदलने के केंद्र सरकार के प्रयासों की सख्त निंदा की गई।
यह भी कहा गया कि 86 प्रतिशत किसानों के पास बहुत थोड़ी जमीन है, जोकि बढ़ई, जुलाहे, मिस्त्री और गैर-हुनरमंद मजदूरों जैसे ग्रामीण श्रमिकों के साथ मिलकर ग्रामीण आर्थिकता की रीढ़ बनते हैं। केंद्र सरकार इन विवादित कानूनों द्वारा उनकी जमीनों और पेशे को छीनकर उनको कारपोरेटों के रहमो-करम पर छोड़ने का रास्ता साफ कर रही है।
प्रस्ताव में मांग की गई कि सुझाए गए कानूनों में किसानों को कानूनी गारंटी प्रदान की जाए कि उनकी उपज की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर नहीं होगी और न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर कृषि उपज की खरीद करना अपराध होगा। इसके साथ ही सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद लाजिमी होनी चाहिए और व्यापक लागतों को ध्यान में रखते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाना चाहिए।