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एक जज, जिन्हें रिटायर होने के बाद मिला इंसाफ...पर कई जजों को दे गए बड़ी राहत

Wed, 13 Jun 2018 01:15 PM IST
विवेक शर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
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संविधान ने न्यायपालिका को इंसाफ देने का जिम्मा सौंपा है, लेकिन जिन जज को यह जिम्मा सौंपा गया है, उन्हें खुद रिटायरमेंट तक इंसाफ नहीं मिला। हालांकि हाईकोर्ट द्वारा प्रशासनिक स्तर पर उन्हें प्रमोट न किए जाने के फुल कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने खारिज करते हुए उन्हें प्रमोट करने और पेंशन व अन्य लाभ उस प्रमोशन के अनुरूप दोबारा निर्धारित करने के आदेश दिए हैं।
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस एबी चौधरी एवं जस्टिस पीबी बजंतरी की खंडपीठ ने हाईकोर्ट के प्रशासकीय पक्ष के फैसले को रद्द करते हुए यह अहम आदेश जारी किए हैं। आदेशों में कहा गया कि पंजाब के एडिशनल सिविल जज (सीनियर डिवीजन) जज जेएस खुशदिल को वर्ष 1999 में एडिशनल सेशन जज के पद पर सिर्फ इसीलिए प्रमोशन नहीं दिया गया कि वे चार वर्ष से अधिक समय तक डेपुटेशन पर रहे थे।

खुशदिल ने उन्हें प्रमोशन नहीं दिए जाने के हाईकोर्ट के प्रशासकीय पक्ष के आदेशों को 2009 में याचिका के माध्यम से चुनौती दी थी। लेकिन याचिका के लंबित रहते ही वह सेवानिवृत्त हो गए । कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याची के जूनियर को प्रमोट करने की तिथि से याचिकाकर्ता की प्रमोशन मानी जाए ओर उसी आधार पर गणना कर सभी लाभ जारी किए जाएं। हाईकोर्ट के फैसले से पंजाब एवं हरियाणा की जिला अदालतों के उन सभी जजों को बड़ी राहत मिली है जोकि हाईकोर्ट द्वारा डेपुटेशन पर बाहर भेजे गए थे।
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यह है मामला

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जेएस खुशदिल को फरवरी 1989 से जुलाई 1991 तक और जुलाई 1996 से अक्तूबर 1998 तक डेपुटेशन पर भेजे गए थे। फरवरी 1999 में जब एडिशनल सेशन जज के पद पर उनकी जगह जूनियर को प्रमोशन दे दी गई। दोबारा हुए प्रमोशन में भी उनके नाम को रिजेक्ट कर दिया गया।

कारण पूछने पर उन्हें जानकारी नहीं दी गई और आरटीआई के आवेदन और रिव्यू को भी खारिज कर दिया गया। फिर  2009 में खुशदिल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। तब उनको बताया गया कि 4 साल की डेपुटेशन के दौरान उनकी एसीआर नहीं बनी है । साथ ही डेपुटेशन की अवधि को सेवाओं में न जोड़े जाने का निर्णय लिया गया है। इस कारण उनका प्रमोशन नहीं किया गया।

... तो कोई जज नहीं जाएगा डेपुटेशन पर
कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि डेपुटेशन पर भेजे जाने से पहले याची बताया ही नहीं गया था कि यह उसके प्रमोशन में बाधा बन सकता है जबकि उसे इसकी पूरी जानकारी दी जानी चाहिए थी। अगर ऐसा ही रहा तो कोई भी जज डेपुटेशन पर नहीं जाएगा। प्रशासकीय पक्ष का फैसला रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को सभी लाभ छह महीने में जारी किये जाने के आदेश दे दिए हैं।
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