कृषि सुधार कानूनों व किसान आंदोलन के बीच अनुबंध खेती यानी कांट्रेक्ट फार्मिंग चर्चा में है। सरकार जहां इसे किसानों के लिए अतिरिक्त मौका बता रही है, तो वहीं आम किसान इसे लेकर शंकित हैं। हालांकि अनुबंध खेती नई नहीं है। पंजाब के कई किसान या तो इसे अपनाए हुए हैं या फिर इसका अनुभव ले चुके हैं। ऐसे ही एक किसान हैं चप्पड़चिड़ी खुर्द के बलजीत सिंह संधू।
इंजीनियर बलजीत सिंह संधू सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त होने के बाद कनाडा चले गए थे। कई वर्ष कनाडा में गुजारने के बाद संधू पंजाब लौटे और अपनी 6 एकड़ पुश्तैनी जमीन पर खेती शुरू की। संधू बताते हैं कि 2010 में कनाडा से लौटकर उन्होंने पॉली हाउस तैयार किया। एक कंपनी के साथ अनुबंध कर आलू, टमाटर, रंगबिरंगी शिमला मिर्च और हाईब्रीड खीरे की फसल लगाई।
अनुबंध में बीज व फर्टिलाइजर की किस्म तय की गई थी। कंपनी कितनी फसल खरीदेगी, यह भी तय था। संधू बताते हैं कि पहला साल अच्छे से निकला। मुनाफा भी हुआ और फसल को लेकर भी कोई समस्या नहीं आई। समस्या दो साल बाद आनी शुरू हुई। समस्या भी आई तो फसल के ज्यादा उत्पादन से। पॉली हाउस में अच्छी देखभाल से फसल का उत्पादन बढ़ गया। कंपनी उतनी ही फसल खरीद रही थी, जितनी अनुबंध में तय थी। अनुबंध की शर्तों के चलते वह अपनी फसल मंडी में भी नहीं बेच पा रहे थे। ऐसे में फसल का ज्यादा उत्पादन उनके लिए समस्या बन गया।
बलजीत बताते हैं कि वह सब्जियों को अपनी कार में भर कर चंडीगढ़ ले जाकर बेचते थे। आलू और टमाटर तो उन्हें सड़क पर फेंकने पड़े। ऐसे में जो शुरूआती दौर में मुनाफा हुआ, वो घाटे का सौदा बन गया। संधू बताते हैं कि उन्होंने 2015 में अनुबंध खेती छोड़ दी और फिर से कनाडा चले गए। कुछ समय वहां रहने के बाद फिर लौटे और अब सरसों व हल्दी की खेती कर रहे हैं। संधू का मानना है कि किसानों को फसली चक्र से बाहर निकल विविधीकरण को अपनाना चाहिए।
केंचुआ खाद में भी उठाया घाटा
संधू ने वर्मी कंपोस्ट यानी केंचुआ खाद तैयार करनी भी शुरू की थी। खेतीबाड़ी विभाग की मदद से सरकारी एजेंसियां इसे खरीदती हैं। इसके लिए बाकायदा प्रावधान है। यहां भी संधू को नुकसान उठाना पड़ा। इसके पीछे संधू सरकारी संस्थानों में फैले भ्रष्टाचार को कारण बताते हैं। उन्होंने बताया कि भ्रष्टाचार के चलते सूखे गोबर को ही वर्मी कंपोस्ट का नाम देकर खरीदा और बेचा जा रहा है। उनका कहना है कि बिना भ्रष्टाचारी चक्र का हिस्सा बने अपना सही उत्पाद तय प्रावधानों के बावजूद बेचना मुश्किल है। इससे किसान को नुकसान ही उठाना पड़ता है। इसी के चलते उन्होंने वर्मी कंपोस्ट के उत्पादन को भी अलविदा कह दिया।