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खामियों से भरी है अनुबंध खेती...शुरू में फायदा, बाद में घाटा, पंजाब के किसान को हुआ कड़वा अनुभव

नवनीत छिब्बर, अमर उजाला, मोहाली Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sat, 19 Dec 2020 03:34 PM IST
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मोहाली के किसान बलजीत सिंह संधू। - फोटो : अमर उजाला

कृषि सुधार कानूनों व किसान आंदोलन के बीच अनुबंध खेती यानी कांट्रेक्ट फार्मिंग चर्चा में है। सरकार जहां इसे किसानों के लिए अतिरिक्त मौका बता रही है, तो वहीं आम किसान इसे लेकर शंकित हैं। हालांकि अनुबंध खेती नई नहीं है। पंजाब के कई किसान या तो इसे अपनाए हुए हैं या फिर इसका अनुभव ले चुके हैं। ऐसे ही एक किसान हैं चप्पड़चिड़ी खुर्द के बलजीत सिंह संधू। 

इंजीनियर बलजीत सिंह संधू सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त होने के बाद कनाडा चले गए थे। कई वर्ष कनाडा में गुजारने के बाद संधू पंजाब लौटे और अपनी 6 एकड़ पुश्तैनी जमीन पर खेती शुरू की। संधू बताते हैं कि 2010 में कनाडा से लौटकर उन्होंने पॉली हाउस तैयार किया। एक कंपनी के साथ अनुबंध कर आलू, टमाटर, रंगबिरंगी शिमला मिर्च और हाईब्रीड खीरे की फसल लगाई। 




अनुबंध में बीज व फर्टिलाइजर की किस्म तय की गई थी। कंपनी कितनी फसल खरीदेगी, यह भी तय था। संधू बताते हैं कि पहला साल अच्छे से निकला। मुनाफा भी हुआ और फसल को लेकर भी कोई समस्या नहीं आई। समस्या दो साल बाद आनी शुरू हुई। समस्या भी आई तो फसल के ज्यादा उत्पादन से। पॉली हाउस में अच्छी देखभाल से फसल का उत्पादन बढ़ गया। कंपनी उतनी ही फसल खरीद रही थी, जितनी अनुबंध में तय थी। अनुबंध की शर्तों के चलते वह अपनी फसल मंडी में भी नहीं बेच पा रहे थे। ऐसे में फसल का ज्यादा उत्पादन उनके लिए समस्या बन गया। 

बलजीत बताते हैं कि वह सब्जियों को अपनी कार में भर कर चंडीगढ़ ले जाकर बेचते थे। आलू और टमाटर तो उन्हें सड़क पर फेंकने पड़े। ऐसे में जो शुरूआती दौर में मुनाफा हुआ, वो घाटे का सौदा बन गया। संधू बताते हैं कि उन्होंने 2015 में अनुबंध खेती छोड़ दी और फिर से कनाडा चले गए। कुछ समय वहां रहने के बाद फिर लौटे और अब सरसों व हल्दी की खेती कर रहे हैं। संधू का मानना है कि किसानों को फसली चक्र से बाहर निकल विविधीकरण को अपनाना चाहिए।

केंचुआ खाद में भी उठाया घाटा
संधू ने वर्मी कंपोस्ट यानी केंचुआ खाद तैयार करनी भी शुरू की थी। खेतीबाड़ी विभाग की मदद से सरकारी एजेंसियां इसे खरीदती हैं। इसके लिए बाकायदा प्रावधान है। यहां भी संधू को नुकसान उठाना पड़ा। इसके पीछे संधू सरकारी संस्थानों में फैले भ्रष्टाचार को कारण बताते हैं। उन्होंने बताया कि भ्रष्टाचार के चलते सूखे गोबर को ही वर्मी कंपोस्ट का नाम देकर खरीदा और बेचा जा रहा है। उनका कहना है कि बिना भ्रष्टाचारी चक्र का हिस्सा बने अपना सही उत्पाद तय प्रावधानों के बावजूद बेचना मुश्किल है। इससे किसान को नुकसान ही उठाना पड़ता है। इसी के चलते उन्होंने वर्मी कंपोस्ट के उत्पादन को भी अलविदा कह दिया।
 

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मोहाली के किसान बलजीत सिंह संधू। - फोटो : अमर उजाला
कृषि सुधार कानूनों व किसान आंदोलन के बीच अनुबंध खेती यानी कांट्रेक्ट फार्मिंग चर्चा में है। सरकार जहां इसे किसानों के लिए अतिरिक्त मौका बता रही है, तो वहीं आम किसान इसे लेकर शंकित हैं। हालांकि अनुबंध खेती नई नहीं है। पंजाब के कई किसान या तो इसे अपनाए हुए हैं या फिर इसका अनुभव ले चुके हैं। ऐसे ही एक किसान हैं चप्पड़चिड़ी खुर्द के बलजीत सिंह संधू। 

इंजीनियर बलजीत सिंह संधू सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त होने के बाद कनाडा चले गए थे। कई वर्ष कनाडा में गुजारने के बाद संधू पंजाब लौटे और अपनी 6 एकड़ पुश्तैनी जमीन पर खेती शुरू की। संधू बताते हैं कि 2010 में कनाडा से लौटकर उन्होंने पॉली हाउस तैयार किया। एक कंपनी के साथ अनुबंध कर आलू, टमाटर, रंगबिरंगी शिमला मिर्च और हाईब्रीड खीरे की फसल लगाई। 


अनुबंध में बीज व फर्टिलाइजर की किस्म तय की गई थी। कंपनी कितनी फसल खरीदेगी, यह भी तय था। संधू बताते हैं कि पहला साल अच्छे से निकला। मुनाफा भी हुआ और फसल को लेकर भी कोई समस्या नहीं आई। समस्या दो साल बाद आनी शुरू हुई। समस्या भी आई तो फसल के ज्यादा उत्पादन से। पॉली हाउस में अच्छी देखभाल से फसल का उत्पादन बढ़ गया। कंपनी उतनी ही फसल खरीद रही थी, जितनी अनुबंध में तय थी। अनुबंध की शर्तों के चलते वह अपनी फसल मंडी में भी नहीं बेच पा रहे थे। ऐसे में फसल का ज्यादा उत्पादन उनके लिए समस्या बन गया। 

बलजीत बताते हैं कि वह सब्जियों को अपनी कार में भर कर चंडीगढ़ ले जाकर बेचते थे। आलू और टमाटर तो उन्हें सड़क पर फेंकने पड़े। ऐसे में जो शुरूआती दौर में मुनाफा हुआ, वो घाटे का सौदा बन गया। संधू बताते हैं कि उन्होंने 2015 में अनुबंध खेती छोड़ दी और फिर से कनाडा चले गए। कुछ समय वहां रहने के बाद फिर लौटे और अब सरसों व हल्दी की खेती कर रहे हैं। संधू का मानना है कि किसानों को फसली चक्र से बाहर निकल विविधीकरण को अपनाना चाहिए।

केंचुआ खाद में भी उठाया घाटा
संधू ने वर्मी कंपोस्ट यानी केंचुआ खाद तैयार करनी भी शुरू की थी। खेतीबाड़ी विभाग की मदद से सरकारी एजेंसियां इसे खरीदती हैं। इसके लिए बाकायदा प्रावधान है। यहां भी संधू को नुकसान उठाना पड़ा। इसके पीछे संधू सरकारी संस्थानों में फैले भ्रष्टाचार को कारण बताते हैं। उन्होंने बताया कि भ्रष्टाचार के चलते सूखे गोबर को ही वर्मी कंपोस्ट का नाम देकर खरीदा और बेचा जा रहा है। उनका कहना है कि बिना भ्रष्टाचारी चक्र का हिस्सा बने अपना सही उत्पाद तय प्रावधानों के बावजूद बेचना मुश्किल है। इससे किसान को नुकसान ही उठाना पड़ता है। इसी के चलते उन्होंने वर्मी कंपोस्ट के उत्पादन को भी अलविदा कह दिया।
 

सरकार बदलते ही अनुबंध खेती पर मिल रही मदद भी हुई बंद

अनुबंध खेती पर बलजीत सिंह पंजाब का ही उदाहरण देते हैं। कहते हैं, पिछली कैप्टन सरकार के दौरान अनुबंध खेती की शुरुआत हुई। किसानों को प्रोत्साहित करने के नाम पर विदेश से किन्नू के 10 लाख पौधे मंगवाए गए थे। इन्हें किसानों को निशुल्क बांटा गया। ये पौधे लगाने वाले किसानों को अगले 10 सालों तक उत्पादन और फसल बेचने में मदद के लिए कहा गया था। सरकार बदलते ही ये मदद बंद हो गई और किसान परेशानी में आ गए। निशुल्क बांटे गए पौधों की गुणवत्ता भी अच्छे स्तर की नहीं थी। लिहाजा किसानों को ये पौधे अपने खेतों से उखाड़ने पड़े। संधू कहते हैं कि सत्ता बदलते ही नियम और प्रावधान भी बदल जाते हैं। इसका खामियाजा किसानों व आम आदमी को उठाना पड़ता है।

अड़ियल रुख को छोड़कर संयुक्त समिति नया प्रारूप तैयार करे
कृषि सुधार कानूनों पर बलजीत सिंह ने कहा कि एमएसपी का प्रावधान किसान को सुरक्षा देने के लिए है। इसका उद्देश्य है कि किसान को उसकी लागत व लेबर सहित तमाम खर्च मिलाकर कम से कम 10 प्रतिशत मुनाफा हो। हालांकि संधू का कहना है कि पिछले दशकों में जिस दर से वेतन वृद्धि हुई या फिर अन्य उत्पादों की दरों में इजाफा हुआ, उस दर से किसान की फसल की कीमत में बढ़ोतरी नहीं हुई। संधू भी कानूनों में संशोधन की जरूरत महसूस करते हैं। उनका कहना है कि सरकार अगर चाहे तो किसी भी समस्या का हल मुश्किल नहीं है। दोनों ही पक्ष अड़ियल रुख न अपनाएं। सरकार कुछ समय के लिए कानूनों को लागू न करे और एक संयुक्त कमेटी बनाए, जिसमें सरकार व किसान अपने अपने विशेषज्ञों को शामिल करें। ये कमेटी कानूनों पर पुनर्विचार कर इसके नए प्रारूप को तैयार करे। 

अनुबंध खेती से किसान ही नहीं उपभोक्ता को भी हानि
बलजीत कहते हैं कि अनुबंध खेती से किसानों को ही नुकसान नहीं होगा, बल्कि छोटे व्यापारी व आम उपभोक्ता भी इससे अछूते नहीं रहेंगे। संधू कहते हैं कि अनुबंध करने वाली कंपनी गुणवत्ता रखरखाव के नाम पर बीज देगी, खाद, यूरिया और पेस्टिसाइड उपलब्ध कराएगी। इससे इस धंधे से जुड़े छोटे दुकानदारों व व्यापारियों का धंधा चौपट होगा। इसके लिए वह विदेशों का उदाहरण देते हैं। किसान अपनी फसल कंपनियों को बेचेगा, जिन्हें ये कंपनियां अपने शापिंग मॉल्स में ऊंचे दामों पर बेचेंगी। इसका असर आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा और छोटे कारोबारी खत्म होंगे। 

आर्थिक संकट के समय साथ खड़ी नहीं होगी कंपनी
किसान की जमीन पर संकट को लेकर संधू कहते हैं कि अनुबंध के दौरान कंपनी किसान को एडवांस के तौर पर निर्धारित सीमा तक धनराशि देगी, जो किसान के लिए काफी नहीं होगी। अनुबंध खेती में जाने के बाद किसान आढ़ती से भी पैसा नहीं उठा पाएगा। ऐसे में किसान के पास जमीन गिरवी रखने के अलावा अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का साधन नहीं होगा।
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