आखिरकार 52 साल की लंबी जद्दोजहद के बाद आर्मी के एक बूढ़े शेर ने सेना से जंग जीत ली है। खरड़ के त्रियूड़ में रहने वाले 80 वर्षीय बोरा सिंह को अब सेना से पेंशन मिलेगी।
उन्होंने एक दर्जन से अधिक रक्षा मंत्रालय को पत्र लिखे, जब न्याय नहीं मिला तो घर बैठ गए। इसके बाद उन्हें सैनिकों की न्याय के लिए लड़ने वाली संस्था एक्स सर्विसमैन ग्रीवसेंज सेल का साथ मिला। संस्था ने उनका केस चंडीगढ़ आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (एएफटी) में दायर किया।
ट्रिब्यूनल में जो उनकी तरफ से दलील दी गई, उसे एएफटी ने मानने से मना कर दिया और उनकी याचिका रद्द कर दी। इसके बावजूद न तो संस्था ने हार मानी और न ही बूढ़े शेर ने। उन्होंने एएफटी के आर्डर को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में चैलेंज किया।
हाईकोर्ट ने उनकी दलील स्वीकार कर ली और सेना को साल 2007 से पेंशन का एरियर, पेंशन और अन्य लाभ देने का आदेश जारी किया।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के मुताबिक जब भी पेंशन संबंधी कोई बहुत पुराना मामला सामने आएगा तो ऐसे में याची को केस दायर करने से पहले के सिर्फ तीन साल का ही एरियर देय होगा। बोरा सिंह की ओर से 2010 में केस दायर किया गया था इसीलिए उन्हें 2007 से एरियर मिलेगा।
करीब नौ साल तक की सेना में नौकरी
80 साल से ऊपर बोरा सिंह ने 24 जून को 1953 में टैंक यूनिट की आर्मी नाइन हॉर्स ज्वाइन किया। करीब नौ साल तक सेना की नौकरी की। साल 1962 में जब वे घर पर लौटकर आए तो उन्हें सीजोफ्रीनिया का अटैक पड़ गया। कुछ दिन घर में इलाज के बाद परिजनों ने फिर से यूनिट में भेज दिया।
11 नवंबर 1962 में सेना ने उनकी छुट्टी कर दी और निशक्त पेंशन के लिए सिफारिश भी कर दी, लेकिन सीडीए इलाहाबाद ने उन्हें पेंशन देने से मना कर दिया। सीडीए की मेडिकल एडवाइजर ने दलील दी कि सीजोफिनिया की बीमारी बोरा सिंह अपने घर से लेकर आएं, इसलिए पेंशन का सवाल ही नहीं बनता।
इलाहाबाद से पेंशन खारिज होने के बाद उनसे रक्षा मंत्रालय में अपील करने को कहा गया। बोरा सिंह ने छह से सात बार मंत्रालय में अपील की, लेकिन उन्हें धक्के खाने के अलावा कुछ नहीं मिला।
तंगी के चलते नहीं ठीक करा पाए हिप ज्वाइंट
सेना की ओर से कोई भी मदद नहीं मिलने से बोरा सिंह के परिवार में तंगी छा गई। कुछ साल पहले उनके हिप का ज्वाइंट टूट गया था, लेकिन उसके इलाज के लिए उनके पास रुपया भी नहीं था। कोई मदद नहीं मिलने पर वे चुपचाप घर पर बैठ गए। किसी तरह से घर का गुजारा चलता रहा।
चार साल पहले जब एक्ससर्विसमैन ग्रीवसेंज सेल ने फौज से संबंधित कार्यक्रम कराया तो बोरा सिंह वहां पर पहुंचे और संस्था से मुलाकात हुई। जब बोरा की कहानी संस्था के लेफ्टिनेंट कर्नल एसएस सोही को पता चली तो उनकी लड़ाई लड़ने का फैसला लिया।
संस्था साल 2010 से उनका केस मुफ्त में ही लड़ रही है। जब हाईकोर्ट ने पेंशन देने का फैसला दिया तो संस्था के लोगों ने बोरा सिंह को मिठाई खिलाकर जश्न मनाया।