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65 की भारत-पाक जंग का हीरो सैनिक नहीं, एक गडरिया था

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पाकिस्तान को धूल चटाने वाले 1965 के युद्ध में भारत को लीड एक गड़ेरिए से मिली थी। पाकिस्तान सेना जब कश्मीर में घुसने की तैयारी कर रहे थे, तभी इसकी सूचना आर्मी को लग गई और वह अलर्ट हो गई।
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जरनल हरबख्श सिंह ने अपनी बुक वार डिस्पेचस में इसका उल्लेख किया है। उनके किताब के कुछ अंश को सेना के एक्सपर्ट निखिल गोखले ने अपनी बुक 1965 टर्निंग दी टाइड में किया है।

उनके मुताबिक गड़रिया मोहम्मद दीन बारामुला जिले के गुलमर्ग में दारा कस्सी में रहता था। नौ अगस्त को उसने देखा कि दो पाक आर्मी जवान हरे सलवार कमीज में इलाके में घूम रहे हैं।
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आर्मी जवानों ने मोहम्मद दीन से कुछ जानकारी ली और इसके बदले उसे 400 रुपये घूस भी थी। मोहम्मद दीन ने इस बारे में लोकल पुलिस स्टेशन तनमार्ग को सूचित कर दिया। पुलिस स्टेशन ने आर्मी को अलर्ट कर दिया। अलर्ट मिलते ही सेना ने इलाके में पेट्रोलिंग तेज कर दी और कई सारे घुसपैठिए पकड़े गए। काफी सारे हथियार और गोला बारूद्ध भी मिले।

उसी दौरान एक और रोचक घटना हुई। धभ्रोट के रहने वाले वजीर मोहम्मद ने भी मेंढार सेक्टर में कुछ लोगों को हथियार के साथ संदिग्ध हालात में देखा। इन लोगों ने भी वजीर मोहम्मद को रुपये की पेशकश देकर मदद मांगी। मोहम्मद वजीर भी ने वही किया, जो मोहम्मद दीन ने किया था। उन्होंने इसकी जानकारी सेना को दी।

अलर्ट मिलते ही सेना ने घुसपैठियों पर हमला कर दिया। इसमें कुछ भारतीय सैनिक भी मारे गए, लेकिन घुसपैठियों को भगाने में कामयाबी मिली। युद्ध समाप्ति के बाद दोनों ही नागरिकों को सम्मानित किया गया।
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युद्ध के कुछ सबक भी हैं

कॉमफेड (कम्युनिकेशन फॉर एजुकेशन एण्ड डेवलपमेंट)1965 के युद्ध के हीरोज का स्मरण करते हुए 2 माह लंबा कैम्पेन ‘’थैंक यू हीरोज़‘’ चला रहा है। युद्ध के 50 वर्ष पूरे होने पर चंडीगढ़ में युद्ध के कुछ संस्मरण याद किए गए।

ले. जनरल रिटायर्ड दीपिंदर सिंह (जिन्होंने 1965 की लड़ाई में हिस्सा लिया था) ने कहा, ‘’1965 की लड़ाई को याद रखना जरूरी है, क्योंकि इसने हमें 1962 की हार के अपमान से बाहर निकाला, और हमें 1971 की लड़ाई में जीतने का आत्मविश्वास दिया। उन्होंने बताया कि इस जीत से कुछ सबक भी निकले।

1.प्लानिंग की काफी कमी थी।
2.एयरफोर्स और आर्मी के बीच को-आर्डिनेशन की काफी कमी थी।
3.सेना का छोटा अफसर भी काफी मायने रखता है।
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