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लविवि: एमए व एमकॉम में सीबीसीएस शुरू होने पर अब भी कश्मकश

Fri, 25 Mar 2016 03:54 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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लखनऊ विश्वविद्यालय के आगामी सत्र में भी चॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम (सीबीसीएस) सिर्फ खानापूर्ति बनकर ही रह जाएगा। स्टूडेंट्स को इस व्यवस्था के तहत इंटरडिसिप्लिनेरी सब्जेक्ट्स पढ़ने को नहीं मिल पाएंगे।
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विवि में नए सत्र की प्रवेश प्रक्रिया पर तो मंथन शुरू हो चुका है, लेकिन फिलहाल एमए और एमकॉम में सीबीसीएस लागू होता नजर नहीं आ रहा। अभी तक विभागाध्यक्षों को इसकी तैयारी के लिए कोई निर्देश नहीं दिए गए हैं।

ऐसे में साइंस के स्टूडेंट्स को इलेक्टिव विषय के रूप में साइंस के ही विषय पढ़ने को मिलेंगे। वह चाहकर भी अन्य स्ट्रीम के विषय नहीं पढ़ सकते। मालूम हो कि विवि ने वर्तमान सत्र में एमएससी और एमबीए के पाठ्यक्रमों में सीबीसीएस लागू हो चुका है।
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दो महीने बाद भी पहले जैसी स्थिति

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने यह सोचकर सीबीसीएस लागू करने के लिए कहा जिससे छात्र-छात्राएं केवल डिग्री पाने के लिए अपने विषय तक सीमित होकर न रह जाएं, बल्कि वह अपने रुझान के अनुसार अन्य विषयों की भी पढ़ाई कर सकें।

दरअसल, सीबीसीएस का उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना है, जिसमें साइंस का स्टूडेंट भी हृयूमेनिटीज का विषय पढ़ सके। वहीं, आर्ट्स के स्टूडेंट्स इच्छानुसार साइंस या कॉमर्स के सब्जेक्ट को पढ़ें, लॉ की जानकारी लें।

इसके लिए सभी कोर्स में कुछ ऐसे इलेक्टिव विषय तैयार किए जाते हैं जिन्हें दूसरी स्ट्रीम के स्टूडेंट्स पढ़ सकें। मगर, एलयू में यह व्यवस्था इस प्रारूप में लागू नहीं हो पा रही। विवि ने कहा था कि आगामी सत्र में एमए और एमकॉम में भी सीबीसीएस लागू होने से इसका असल उद्देश्य पूरा होने लगेगा।

विवि के विभिन्न विभागाध्यक्षों से बात करने पर उन्होंने बताया कि अभी तक उन्हें इस संबंध में कोई निर्देश नहीं दिए गए, जिससे कि वह अपनी तैयारी करें।

कुलपति प्रो. एसबी निमसे ने बीती जनवरी में कहा था कि वह जल्द ही विभागों को इलेक्टिव पेपर तैयार करने के लिए कहेंगे, जिन्हें एकेडमिक काउंसिल से पास कराया जाएगा, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

कॉलेजों में सबसे अधिक समस्या

- फोटो : getty images
सीबीसीएस को लेकर सबसे अधिक समस्या कॉलेजों में है। एलयू सहयुक्त महाविद्यालय शिक्षक संघ (लुआक्टा) के अध्यक्ष डॉ. मनोज पांडेय कहते हैं कि एलयू से संबद्ध कॉलेजों में एमएससी के कोर्स बहुत ही कम जगह उपलब्ध हैं।

बीएसएनवी सहित कुछ कॉलेजों में तो एमएससी का एक कोर्स ही है। यदि विवि एमए और एमकॉम में यह व्यवस्था लागू करता तो उसका लाभ पूरी तरह से कॉलेजों तक पहुंच सकता था, लेकिन अभी ऐसा नहीं है।

डॉ. मनोज कहते हैं कि 80 फीसदी स्टूडेंट कॉलेजों में पढ़ते हैं जबकि विवि में 20 फीसदी। लेकिन योजना बनाते समय इन 80 फीसदी स्टूडेंट्स पर कम ध्यान रहता है। विवि के कुछ विभागाध्यक्षों का तर्क है कि एमए में कोर्स अधिक होने की वजह से इलेक्टिव पेपर भी काफी अधिक बनेंगे।

इसके लिए वर्तमान में शिक्षकों की संख्या भी पर्याप्त नहीं। वहीं, लुआक्टा के अनुसार कॉलेजों के शिक्षकों को भी इलेक्टिव पेपर तैयार करने में शामिल किया जाना चाहिए जिससे यह समस्या दूर हो जाएगी।
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स्टूडेंट्स को भा रहा इंटरडिसिप्लिनेरी सब्जेक्ट

नेशनल पीजी कॉलेज की बात करें तो यहां सीबीसीएस पूरी तरह से लागू है। स्टूडेंट्स भी इसका पूरा फायदा उठा रहे हैं। प्राचार्य डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि उनके यहां यूजी के करीब 1600 स्टूडेंट्स में से 1250 ऐसे हैं जिन्होंने साइकोलॉजी में स्ट्रेस मैनेजमेंट का पेपर लिया हुआ है।

वहीं, बीए के बहुत से स्टूडेंट्स ने साइंस स्ट्रीम में हॉर्टिकल्चर व हार्डवेयर के इलेक्टिव पेपर चुने हैं। इसे देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्टूडेंट अन्य स्ट्रीम के पेपर पढ़ने में काफी रुझान दिखा रहे हैं।

पीजी स्तर पर कॉलेज में सिर्फ एमए और एमकॉम की पढ़ाई होने से कम चॉइस रहती है।
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