रिकार्ड कुछ और ही हकीकत बयां कर रहे हैं
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प्रदेश में चल रहे बीएड कॉलेज भले ही संसाधन और जरूरी मानक पूरे करने का दावा कर रहे हों, लेकिन रिकार्ड कुछ और ही हकीकत बयां कर रहे हैं। हालात ये हैं कि प्रदेश के 90 फीसदी कॉलेज अस्थायी मान्यता के सहारे चल रहे हैं, जबकि मात्र दस फीसदी कॉलेजों के पास स्थायी मान्यता है। अस्थायी मान्यता की पटरी पर दौड़ रहे इन कॉलेजों में विद्यार्थियों का भविष्य कितना सुरक्षित होगा, यह बताने की जरूरत नहीं है।
सरकार ने प्रदेश के सभी 524 बीएड कॉलेज एमडीयू, कुरुक्षेत्र और सिरसा यूनिवर्सिटी से लेकर जींद यूनिवर्सिटी के हवाले कर दिए हैं। इसके बाद से घमासान मचा है। अमर उजाला ने जब इन कॉलेजों की मान्यता को गहराई से जांचा तो बड़ा खुलासा हुआ। मालूम चला है कि प्रदेश में चल रहे बीएड कॉलेजों में से केवल 10 फीसदी के पास ही स्थायी मान्यता है, जबकि 90 फीसदी कॉलेजों की डोर अस्थायी मान्यता से बंधी है। एमडीयू के तहत 327 बीएड कॉलेज आते हैं, जिसमें से केवल दर्जन भर कॉलेजों के पास स्थायी मान्यता है। खास बात यह है कि एमडीयू में पिछले दो वर्षों से एक भी कॉलेज ने स्थायी मान्यता नहीं ली।
ये भी कारण : स्थायी मान्यता के कड़े नियम, खर्च भी मोटा
स्थायी मान्यता के लिए बीएड कॉलेजों को सभी नियम पूरे करने होते हैं। मसलन, कॉलेज के पास सभी फैकल्टी रेगुलर होनी चाहिए। कॉलेज की बिल्डिंग से लेकर संसाधन तक नियम के अनुसार होने चाहिए। इन नियमों को पूरा करने के लिए कॉलेज का काफी बजट खर्च हो जाता है। पूरी प्रक्रिया के बाद यूनिवर्सिटी की टीम कॉलेज का निरीक्षण करती है। निरीक्षण में सब ठीक मिलने के बाद करीब तीन लाख की फीस जमा करनी होती है। इसे बाद विश्वविद्यालय से स्थायी मान्यता मिलती है। यूनिवर्सिटी की टीम को हर तीन साल बाद भी निरीक्षण करना होता है।