12वीं करने के बाद डॉक्टर बनने की चाहत का रास्ता एक छात्र के लिए एक लाख से ऊपर खर्च से होकर गुजरता था। एआईपीएमटी के अलावा वह कम से कम 15 प्रवेश परीक्षाओं में बैठता था।
इससे न केवल उस पर आर्थिक भार था बल्कि हर परीक्षा के पैटर्न के हिसाब से अलग तैयारी का दबाव भी। सुप्रीम कोर्ट के नेशनल एलिजबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट(नीट) लागू करने के बाद इन सभी मुश्किलों से मुक्ति मिल गई है।
मेडिकल की पढ़ाई यूं ही महंगी है, ऊपर से प्रवेश परीक्षाओं का खर्च। अनुमान के मुताबिक एक छात्र हर साल 15 से अधिक प्रवेश परीक्षाओं में केवल आवेदन पत्र के शुल्क के तौर पर ही 29 हजार रुपये से ऊपर खर्च करता था। परीक्षा केंद्र अगर राज्य से बाहर है तो आने-जाने का खर्च अलग।
कुल मिलाकर सभी परीक्षाओं का पूरा खर्च लगभग एक लाख रुपये पड़ता था। इसके बाद भी दाखिला मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। ऊपर से अगर निजी मेडिकल कॉलेज में दाखिले की कोशिश करो तो वहां चोरी छिपे डोनेशन की मार।
परीक्षा के दौरान मिली गड़बड़ी
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अब सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए कॉमन प्रवेश परीक्षा नीट के फैसले से देश के हर साल सात लाख से अधिक इस परीक्षा में शामिल होने वाले युवाओं को बड़ी राहत मिली है। वीआर क्लासेज के एमडी वैभव राय के मुताबिक इससे छात्रों में खुशी की लहर है।
डॉक्टर बनने को यह देनी होती थी परीक्षाएं
परीक्षा का नाम - शुल्क(रुपये में)
एआईपीएमटी - 1400
यूपीएमटी - 2000
एम्स - 1000
एएफएमसी - 250
यूपीसीपीएमटी - 1400
एएमयू - 800
मनिपाल पीएमटी - 2000
आईपीयू - 1000
सीएमसी - 1000
जिपमर - 1000
कॉमेड के - 1200
एमजीआईएमएस वर्धा - 5000
आर्मी डेंटल - 800
यूपीसीएमईटी - 1022
भारती विद्यापीठ, पुणे - 2200
सेंट जोंस - 1750
बीएएमस, बीएचएमएस, वेटरनेरी - 6000
आवेदन पत्र का कुल खर्च - 29822
मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में बैठना और डॉक्टर बनना अब तक केवल मध्यम वर्ग या इससे ऊपर के लिए आसान माना जाता था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद इतना खर्च बचेगा तो पहाड़ का गरीब बच्चा भी डॉक्टर बनने का ख्वाब देख सकेगा।
- विपिन बलूनी, एमडी, बलूनी क्लासेज