श्रीलंका गहराते वित्तीय और मानवीय संकट की खाई में डूबता जा रहा है। मुद्रास्फीति का रिकॉर्ड स्तर, खाद्य पदार्थों की कीमतों में उछाल और कोरोना महामारी से पैदा हुई परेशानियों के कारण देश के खजाने सूख रहे हैं। हालात यहां तक खराब हो चुके हैं कि इस देश के इस साल दिवालिया होने की आशंका है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश को अगले 12 महीनों में घरेलू और विदेशी ऋणों में अनुमानित 7.3 अरब डॉलर चुकाने की जरूरत है।
विदेशी मुद्रा भंडार न्यूनतम स्तर पर
घरेलू और विदेशी ऋणों में जनवरी में देय 500 मिलियन डॉलर का अंतरराष्ट्रीय सॉवरेन बांड पुनर्भुगतान शामिल है। देश के विदेशी मुद्रा भंडार की अगर बात करें तो नवंबर तक यह महज 1.6 अरब डॉलर था, जो अब तक का न्यूनतम स्तर है। रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू ऋणों और विदेशी बांडों को चुकता करने के लिए पैसे की छपाई में तेजी ने मुद्रास्फीति को एक महीने पहले के 9.9 प्रतिशत की तुलना में दिसंबर में इसे 12.1 प्रतिशत के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दिया। कोलंबो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक द्वारा मापी गई मासिक मुद्रास्फीति खाद्य और गैर-खाद्य वस्तुओं दोनों की कीमतों में मासिक वृद्धि से प्रेरित थी।
खाद्य मुद्रास्फीति 22.1 फीसदी पर
देश के केंद्रीय बैंक की ओर से की गई घोषणा के अनुसार, दिसंबर खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति एक महीने पहले 17.5 प्रतिशत से बढ़कर 22.1 प्रतिशत हो गई है। इसके अलावा कोरोना संकट के कारण देश का टूरिज्म सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हुआ। साथ ही सरकारी खर्च में बढ़ोतरी और टैक्स में कटौती ने हालात को और बदतर बना दिया। वहीं चीन का कर्ज चुकाते-चुकाते श्रीलंका की कमर टूट चुकी है। इन बड़ी परेशानियों ने राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के सामने देश में आर्थिक मंदी के खतरे को और भी बढ़ा दिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो कर्ज के जाल में फंसकर श्रीलंका दिवालिया होने की कगार पर पहुंच चुका है।
देश के 5 लाख लोग गरीबी में फंसे
विश्व बैंक के अनुमानों के मुताबिक महामारी के शुरू होने के बाद से देश में 500,000 लोग गरीबी के जाल में फंस गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जो परिवार पहले संपन्न माने जाते थे, उनके लिए भी दो जून की रोटी जुटानी मुश्किल पड़ रही है। देश के अधिकांश परिवारों के लिए अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने लाले पड़े हैं। देश में आर्थिक आपातकाल की स्थिति के बीच यात्रा और पर्यटन क्षेत्र में ही करीब दो लाख से ज्यादा लोगों का रोजगार खत्म हो चुका है और यही हालात दूसरे क्षेत्रों में बने हुए हैं।