डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। मंगलवार सुबह इंट्रा डे बैंकिंग में रुपया टूटकर 80 रुपये के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया। इससे शेयर मार्केट में भगदड़ मच सकती है और विदेशी निवेशक तेजी से अपना पैसा बाजार से बाहर निकाल सकते हैं। इससे छोटे निवेशकों को बाजार में तगड़ा झटका लग सकता है और उनके लाखों करोड़ों रुपये बाजार में डूब सकते हैं। वहीं, रुपये के कमजोर होने से भारत में पेट्रोल-डीजल का आयात महंगा हो सकता है। इससे घरेलू बाजार में सामानों का आवागमन महंगा हो सकता है और महंगाई की एक औऱ तगड़ी चोट लग सकती है। सोमवार को ही केंद्र ने आवश्यक वस्तुओं पर पांच फीसदी से लेकर 18 फीसदी तक की जीएसटी दरों का एलान किया था। इससे भी महंगाई दर में बढ़ोतरी हो सकती है।
केंद्र सरकार में पूर्व सचिव अजय शंकर ने अमर उजाला को बताया कि रुपये के गिरने को हमेशा नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है, लेकिन तुलनात्मक रूप से यह उतना भी बुरा नहीं होता। बल्कि हमें इस आपदा को अवसर में तब्दील करना चाहिए। उन्होंने कहा कि रुपये के गिरने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में हमारे उत्पाद सस्ते होते हैं जिससे भारतीय वस्तुओं की मांग बढ़ जाती है। भारतीय रुपये के लगातार कमजोर होने का एक सीधा लाभ हमें यह दिखाई पड़ रहा है कि भारत का निर्यात लगातार वृद्धि कर रहा है। इससे बाजार में निर्माण सेक्टर में बढ़ोतरी होगी और रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी।
अजय शंकर ने बताया कि चीन और जापान ने जानबूझकर अपनी करेंसी को अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिराकर रखा। इससे चीन और जापान के उत्पाद सस्ते हो गए और वे पूरी दुनिया के बाजार में छा गए, जबकि भारतीय सरकारों ने रुपये को लगातार मजबूत बनाए रखने पर ध्यान दिया, जिससे हमारे उत्पाद पिछड़ने लगे। उन्होंने कहा कि सरकार को रुपये के गिरने को कंट्रोल करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताता है कि बाजार में किसी करेंसी के कमजोर होने को सरकारें या केंद्रीय बैंक एक हद से ज्यादा रोक नहीं पाते हैं। सरकार ज्यादा से ज्यादा भारी मात्रा में डॉलर की बिकवाली कर रुपये की कमजोरी को कुछ देर के लिए धीमा कर सकती है। सरकार अब तक दो बिलियन डॉलर की बिकवाली कर रुपये को गिरने से रोकने की कुछ कोशिश कर चुकी है। लेकिन इससे भारत के डॉलर भंडार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
मेटल कंटेनर मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष संजय भाटिया ने कहा कि करेंसी के कमजोर होने से निर्यात को लाभ मिलता है, लेकिन इसका असली लाभ हमें नहीं मिल पाता क्योंकि विदेशी व्यापारी अपने माल का अवमूल्यन करके इस लाभ को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर लेते हैं। सरकारें भी वस्तुओं पर टैक्स कम करके इस लाभ को कम या शून्य करने की कोशिश करती हैं। हाल ही में भारतीय चावल के दाम सस्ते हो गए थे, जिससे बांग्लादेश में भारतीय चावल ज्यादा सस्ते पड़ने लगे। बांग्लादेश ने अपना टैक्स घटाकर भारत के इस लाभ को कमजोर कर दिया और भारतीय चावल उत्पादकों को वह लाभ नहीं मिल पाया जिसकी उम्मीद की जा रही थी।
भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ यहां का एमएसएमई सेक्टर है जहां लगभग 95 फीसदी लोग काम करते हैं। लेकिन रुपये के कमजोर होने से वे सामान महंगे हो जाते हैं, जिन्हें आयात कर यहां के छोटे-छोटे व्यापारी माल बनाते हैं। लिहाजा इसका बड़ा लाभ एमएसएमई सेक्टर को नहीं मिल पाता। दूसरी ओर रुपये के कमजोर होने से महंगाई बढ़ने लगती है और जनता खरीद को कम करने की कोशिश करने लगती है। इससे सामानों की बिक्री कम हो जाती है और इस सेक्टर को और ज्यादा नुकसान होने लगता है।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने अमर उजाला से कहा कि भारत अब वैश्विक बाजार का एक सक्रिय भागीदार है। ऐसे में विश्व बाजार में हो रही हलचल से हम पूरी तरह अछूते नहीं रह सकते। रूस-यूक्रेन युद्ध, पेट्रोल-डीजल कीमतों में वृद्धि और विदेशी बाजारों में आई महंगाई के कारण भारत का रुपया कमजोर हो रहा है। हालांकि, यह बात देखने वाली है कि भारतीय रुपया रूबल, येन और अन्य करेंसी के मुकाबले सबसे कम टूटा है।
गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने कहा कि पेट्रोल पर निर्भरता कम करके, भारतीय निर्यात को मजबूत करके और सौर ऊर्जा जैसे उपायों को अपनाकर डॉलर के मुकाबले रुपये में मजबूती लाई जा सकती है। हालांकि, ये समय लेने वाले कदम हैं और इसका असर लंबी रणनीति में ही दिखाई पड़ता है। उन्होंने कहा कि सरकार बाजार को संभालने के लिए पूरी तरह प्रयासरत है और जल्द ही इसमें सुधार दिखाई पड़ेगा। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की टीम लगातार इस दिशा में कार्य कर रही है।