वैश्विक वृद्धि दर का यह आंकड़ा 2.5% की पारंपरिक सीमा से नीचे है, जो मंदी का संकेत है। पूर्वी व मध्य एशिया को छोड़ सभी क्षेत्रों में इस साल 2022 की तुलना में धीमी वृद्धि की आशंका है, जो यूरोप में सर्वाधिक होगी। यहां वृद्धि दर 2.3 फीसदी रह सकती है।
दुनियाभर में मंदी की आशंका गहराने लगी है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (अंकटाड) ने 2023 में वैश्विक विकास दर सिर्फ 2.4 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। संकट के वर्षों को छोड़ दें तो विकास दर चार दशकों में सबसे कम है।
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आशंका है कि 2023 में 2009 जैसा ही मंदी का दौर रहेगा और यह 2024 में भी जारी रह सकता है। हालांकि, इस अवधि में भारत में विकास दर ऊंची रहने का अनुमान है। अंकटाड ने अपनी रिपोर्ट में मौजूदा विकास को 'थमी हुई गति' करार दिया है।
वैश्विक वृद्धि दर का यह आंकड़ा 2.5% की पारंपरिक सीमा से नीचे है, जो मंदी का संकेत है। पूर्वी व मध्य एशिया को छोड़ सभी क्षेत्रों में इस साल 2022 की तुलना में धीमी वृद्धि की आशंका है, जो यूरोप में सर्वाधिक होगी। यहां वृद्धि दर 2.3 फीसदी रह सकती है।
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बेरोजगारी भारत की सबसे बड़ी चिंता
भारत में विकास मुख्य रूप से सरकारी खर्च व बाहरी व्यापार की स्थितियों से प्रभावित रहता है। लेकिन, इसकी सबसे बड़ी चिंता जून, 2023 में 8.5 फीसदी की बेरोजगारी दर है। रिपोर्ट के मुताबिक, आर्थिक विकास से सबको समान रूप से फायदा नहीं हो सकता, क्योंकि असमानता काफी बढ़ गई है। यह आगे चलकर बाधा बन सकती है।