भारतीय रिजर्व बैंक ( आरबीआई ) सोमवार को अपनी तीन दिवसीय मौद्रिक नीति बैठक शुरू कर रहा है। यह बैठक 7 अक्तूबर से 9 अक्तूबर तक चलेगी। बाजार में सभी की नजरें एमपीसी की मीटिंग पर टिकी हैं, क्योंकि केंद्रीय बैंक ने पिछली नौ लगातार बैठकों से रेपो दर को अपरिवर्तित रखा है।
आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास की अध्यक्षता वाली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) मुद्रास्फीति के रुझान, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और घरेलू विकास की संभावनाओं जैसे प्रमुख कारकों पर विचार कर सकती है। मुद्रास्फीति एक चुनौती बनी हुई है, खासकर खाद्य और ईंधन की कीमतों में, जिसमें इस साल की शुरुआत में उछाल देखा गया था।
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति 3.65 प्रतिशत थी, जो आरबीआई के लक्ष्य बैंड के अंतर्गत है, लेकिन इस दौरान खाद्य मुद्रास्फीति 5.65 प्रतिशत रही और यह आरबीआई के मध्यम अवधि के लक्ष्य 4 प्रतिशत से ऊपर है। मुद्रास्फीति के इन दबावों के बावजूद, RBI ने मुख्य रूप से महामारी के बाद आर्थिक सुधार का समर्थन करने के लिए रेपो दर पर यथास्थिति बनाए रखने का विकल्प चुना।
हालांकि, इस बात की चिंता बढ़ रही है कि पश्चिम एशिया में तनाव पर वैश्विक कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों जैसे बाहरी कारक RBI को अपने मौजूदा रुख पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। इस महीने की शुरुआत में केंद्र सरकार ने मौद्रिक नीति समिति में तीन नए सदस्यों की नियुक्ति की। MPC में RBI के तीन सदस्य और केंद्र सरकार की ओर से नियुक्त तीन बाहरी सदस्य शामिल हैं।
बाजार सहभागी और विश्लेषक भविष्य की दरों पर किसी भी अग्रिम मार्गदर्शन के लिए इस बैठक पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों पर अपना दृष्टिकोण जारी रखेगा, लेकिन दरों में अचानक वृद्धि की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।
18 सितंबर को, अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने अपनी समीक्षा बैठक में ब्याज दरों में 50 आधार अंकों की भारी कटौती की घोषणा की। अमेरिकी फेड ने लगातार आठ बैठकों में ब्याज दरों को स्थिर रखने के बाद दरों में कटौती की घोषणा की। एमपीसी बैठक के परिणाम 9 अक्तूबर को घोषित किए जाएंगे, और बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के बीच भविष्य की मौद्रिक नीतियों के लिए दिशा तय करेंगे।