कुछ दिन पहले दिल्ली के इंडिया कॉफी हाउस में मैं एक दोस्त के आने का इंतजार कर रहा था। वहां पांच बुजुर्गों का एक समूह मार्च में लक्षद्वीप की यात्रा करने की योजना पर चर्चा कर रहा था। चर्चा को सुनने से मैं खुद को नहीं रोक सका। वे लक्षद्वीप में स्नॉर्केलिंग करना चाहते थे। समुद्र तट पर इत्मीनान से सैर करना चाहते थे। पहले तो मैं उनकी चर्चा पर हंसे बिना नहीं रह सका, लेकिन तुरंत उनकी उम्र की कल्पना की। महसूस किया कि उनकी सोच में कुछ भी गलत नहीं था। हां, समुद्र तट पर सैर करने की उनकी योजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लक्षद्वीप में समय बिताने संबंधी सोशल मीडिया तस्वीरों से प्ररित थी, जिसे गूगल पर अब तक सर्वाधिक सर्च किया गया।
एक समय था, जब सेवानिवृत्त व्यक्ति के खाली समय व्यतीत करने को सर्दियों में धूप सेंकने, मंदिर जाने और सत्संग सुनने से जोड़कर देखा जाता था। अब यह परंपरा टूट रही है। बेहतर स्वास्थ्य व सामर्थ्य के हिसाब से सेवानिवृत्त लोग दुनिया को जानने के लिए यात्रा करने की इच्छा रखते हैं। यह एक अद्भुत विचार है क्योंकि ऐसे लोग धर्म और आस्था की तलाश में अपनी सेवानिवृत्ति के बाद की उम्र खर्च करने जैसे रुढ़ियों को तोड़ रहे हैं।
बुजुर्गों की यात्रा के लिए अब खास पैकेज
आज कई ऐसी यात्राएं और इससे जुड़े पैकेज हैं, जो विशेष रूप से बुजुर्गों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। इनमें उनके स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जाता है। ये पैकेज जोड़ों (कपल) के साथ उन बुजुर्गों के लिए भी हैं, जो जीवनसाथी के निधन के बाद अकेले रहते हैं। ऐसी यात्राएं लोकप्रिय भी हो रही हैं। इससे सेवानिवृत्त लोगों को उन यात्राओं पर जाने का मौका मिल रहा है, जहां लंबे समय से जाना चाहते थे, लेकिन अपनी पारिवारिक और पेशेवर जिम्मेदारियों के कारण अपने युवा वर्षों में नहीं जा सके।
नई जगह देखने के लिए खुद उठाना चाहते हैं खर्च
एक फाइनेंशियल प्लानर के रूप में मैं ऐसे कई लोगों से मिला हूं, जो सेवानिवृत्ति के बाद भारत भ्रमण के साथ विदेश यात्रा भी करना चाहते हैं। ऐसे मामलों में जिन सेवानिवृत्त जोड़े के बच्चे विदेश में रहते हैं, वे अपनी यात्रा का खर्च खुद उठाना चाहते हैं। साथ ही, अपनी आगे की यात्रा या वापसी में उन जगहों पर जरूर जाना चाहते हैं, जिन्हें वे किसी अन्य पर्यटक की तरह देखना चाहते हैं। कुछ वर्ष पहले तक मौजमस्ती और आराम के लिए बुजुर्गों की यात्रा को स्वीकार कर पाना आसान बात नहीं थी।
जैसे ही मेरा दोस्त आया, मैंने उन बुजुर्गों की जोरदार हंसी की आवाज सुनी क्योंकि उनमें से एक ने अपनी पत्नी को फोन करने में कामयाबी हासिल कर ली थी, जो लक्षद्वीप जाने के लिए समान रूप से उत्सुक थीं। यात्रा करने में झिझक रहे कुछ सदस्यों से यह स्पष्ट हो रहा था कि पूरा समूह मार्च में समुद्र तट की यात्रा और नई जगहों की खोज का उत्सुकता से इंतजार कर रहा था। ऐसे बुजुर्ग युवाओं के लिए भी महान प्रेरणा हैं, जो सेवानिवृत्ति के कई अवसरों के साथ जीवन की आशा करते हैं। हल्के ढंग से कहें तो अगर कोई हमारे प्रधानमंत्री की यात्रा और भारत में नए पर्यटन स्थलों का प्रदर्शन करने के उनके तरीके का अनुसरण करता है तो जल्द ही हमारे पास बुजुर्गों की एक बड़ी संख्या होगी, जो इन स्थानों पर जाना चाहते हैं।
बदल रहा समाज, अब अपराधबोध की जगह नहीं
वास्तव में बुजुर्ग इसलिए भी यात्रा नहीं करते क्योंकि उन्हें ऐसी यात्राओं पर बहुत पैसे खर्च करने का अपराधबोध महसूस होता है। शुक्र है, समाज बदल रहा है क्योंकि कई सेवानिवृत्त लोग फोन और गैजेट की तरह यात्रा के नए चलन से परिचित हैं। बुजुर्गों के बीच यात्रा के बढ़ते चलन का लाभ उठाने के लिए ट्रैवल उद्योग (होटल, टूर ऑपरेटर, एयरलाइंस व ट्रैवल एजेंट) सेवानिवृत्त लोगों को किफायती दरों की पेशकश कर रहा है। इस समूह को लक्षित करने का एक और लाभ है...जरूरी नहीं कि वे सामान्य छुट्टियों के मौसम में ही यात्रा करें।
समय की उपलब्धता यानी छूट पाने का मौका
सेवानिवृति्त के बाद समय की उपलब्धता बुजुर्गों को अतिरिक्त छूट पाने के लिए ऑफ सीजन में यात्रा स्थलों का पता लगाने और कभी-कभार अतिरिक्त छूट पाने का भी मौका देती है। यह वित्तीय रूप से स्वतंत्र कुछ सेवानिवृत्त लोगों को अपराधबोध के बिना पैसे बचाने के फैसले लेने की अनुमति भी देती है। जैसे-जैसे हम दादा-दादी की उस पीढ़ी में प्रवेश कर रहे हैं, जो मोबाइल व तकनीक की समझ रखते हैं और जीवन के प्रति उत्साह रखने वाले हैं, ऐसे लोगों की यात्रा संबंधी जरूरतें पूरी करने वाला बाजार तैयार होना देखने लायक बात होगी।