23 जुलाई को पेश होने वाले बजट को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। वहीं सूत्रों ने बताया कि सरकार बड़ी कंपनियों को अन्य सोर्सिंग विकल्पों की ओर देखने से रोकने के लिए सामान और सेवाएं खरीदने के 45 दिनों के भीतर एमएसएमई को भुगतान करने की आवश्यकता में ढील दे सकती है। इसकी घोषणा 23 जुलाई को पेश किए जाने वाले बजट में की जा सकती है। सूत्रों ने बताया कि सरकार एमएसएमई की तरफ से बजट-पूर्व परामर्श के दौरान आयकर अधिनियम की धारा 43बी(एच) में किए गए बदलावों के बारे में सुझावों पर विचार कर रही है।
पिछले साल सरकार ने जोड़ा था MSME में एक नया खंड
इससे पहले सरकार ने पिछले साल के बजट में देश में एमएसएमई द्वारा सामना किए जाने वाले भुगतान में देरी की चुनौती का समाधान करने के लिए आयकर अधिनियम की धारा 43बी के तहत एक नया खंड जोड़ा था। वित्त अधिनियम 2023 के माध्यम से पेश की गई आयकर अधिनियम की धारा 43बी(एच) के अनुसार, यदि कोई बड़ी कंपनी एमएसएमई को समय पर भुगतान नहीं करती है - लिखित समझौतों के मामले में 45 दिनों के भीतर - तो वह उस खर्च को अपनी कर योग्य आय से नहीं घटा सकती है, जिससे संभावित रूप से अधिक कर लग सकता है। अब एमएसएमई को डर है कि इस प्रावधान के कारण बड़े खरीदार एमएसएमई आपूर्तिकर्ताओं को नजरअंदाज कर सकते हैं और या तो उन एमएसएमई से खरीदना शुरू कर सकते हैं जो उद्यम के साथ पंजीकृत नहीं हैं या गैर-एमएसएमई से। एमएसएमई क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 30 प्रतिशत हिस्सा है और कृषि के बाद ये दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता है।
एमएसपी के वैकल्पिक तंत्र करने चाहिए विकसित- SBI
कृषि उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी की मांग के बीच, भारतीय स्टेट बैंक की एक हालिया शोध रिपोर्ट में सरकार को आगामी केंद्रीय बजट में किसानों का समर्थन करने के लिए वैकल्पिक तंत्र विकसित करने का सुझाव दिया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि फसलों की सरकारी खरीद कुल उत्पादन के लगभग 6 प्रतिशत तक ही सीमित है और बाकी 94 प्रतिशत कृषि उत्पादन का समर्थन करने के लिए कृषि बाजारों और ग्रामीण हाट जैसे वैकल्पिक तंत्रों की आवश्यकता है।
'प्रत्यक्ष उपभोक्ता-किसान इंटरफेस की मिले सुविधा'
शोध रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि सरकार आगामी बजट में राज्यों में अधिक मंडियों (कृषि बाजारों) के विकास के माध्यम से प्रत्यक्ष उपभोक्ता-किसान इंटरफेस की सुविधा प्रदान करके एमएसपी मुद्दे को संबोधित करें। इन बाजारों की स्थापना से किसान अपनी उपज सीधे उपभोक्ताओं को बेच सकेंगे, जिससे उनकी आय और बाजार तक पहुंच में सुधार होगा। वहीं रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि राज्यों को शहरी हाट (साप्ताहिक ग्रामीण बाजार) को बढ़ावा देकर इस पहल का नेतृत्व करना चाहिए, जिससे किसानों को सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ने में मदद मिलेगी।
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका
रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि और संबद्ध गतिविधियों के लिए ऋण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो वित्त वर्ष 14 में 6 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 24 में 20.7 लाख करोड़ रुपये हो गया है। इस बढ़ोत्तरी के बावजूद, एमएसपी तंत्र, मूल्य निर्धारण में सहायक होने के बावजूद, कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन चुनौतियों में राजनीतिक हस्तक्षेप, निजी निवेश को हतोत्साहित करना और गैर-एमएसपी फसलों की उपेक्षा शामिल है। रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि भारतीय कृषि को समर्थन देने के लिए अधिक समावेशी और टिकाऊ ढांचा बनाने के लिए, नीति निर्माताओं को फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना चाहिए, उच्च मूल्य और जलवायु-लचीली फसलों को बढ़ावा देना चाहिए और कृषि विपणन बुनियादी ढांचे को बढ़ाना चाहिए। ऐसे उपाय मौजूदा एमएसपी प्रणाली की कुछ कमियों को दूर करने और किसानों को व्यापक समर्थन प्रदान करने में मदद करेंगे।
'MSP पर कानूनी गारंटी से गैर-MSP फसलों की होगी उपेक्षा'
सभी फसलों पर एमएसपी की कानूनी गारंटी के लिए किसानों की मांग के विवादास्पद मुद्दे पर, रिपोर्ट ने सरकार पर पड़ने वाले संभावित राजकोषीय बोझ पर प्रकाश डाला। इसमें कहा गया है, कि अगर सरकार एमएसपी के तहत सभी फसलों की खरीद करती है, तो वित्त वर्ष 2024 में ऐसी फसलों की खरीद की कुल लागत लगभग 13.5 लाख करोड़ रुपये आती है। इसके अलावा, रिपोर्ट में बताया गया है कि एमएसपी पर कानूनी गारंटी से फलों और सब्जियों जैसी गैर-एमएसपी फसलों की उपेक्षा होगी और कृषि क्षेत्र में निजी निवेश हतोत्साहित हो सकता है। यह निर्यात प्रतिस्पर्धा को भी कम कर सकता है और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में व्यापार विवादों को बढ़ा सकता है।