नीलकुरिंजी फूल
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बहरहाल अगस्त से अक्तूबर तक इसी फूल की बहार होती है। लिहाजा कहा जा सकता है कि लगभग 70 फीसदी शहद इसी फूल के रस का होता है। यहां के आदिवासी लोग इस शहद को तोहफे के तौर पर एक दूसरे को देते हैं और नवजात को भी यही शहद चटाया जाता है। अब ये फूल 2030 में खिलेगा, लेकिन किस पैमाने पर खिलेगा कहना मुश्किल है। जिस तेजी से शहरीकरण के नाम पर कुदरत के साथ खिलवाड़ हो रहा है, उसे देखते हुए बहुत-सी दुर्लभ प्रजातियों को बचाना मुश्किल है। हालांकि, सेव कुरिंजी कैंपेन काउंसिल इस फूल के संरक्षण के लिए बड़े पैमाने पर काम कर रही है और लोगों को जागरूक कर रही है। ताकि, आने वाली पीढ़ियां भी इस खूबसूरत फूल का नजारा कर सकें, लेकिन इनकी कोशिशों के आगे शहरीकरण की मार ज्यादा तेज है। तरक्की और कुदरती खूबसूरती की इस जंग में उम्मीद यही की जा रही है कि कुदरत जीतेगी।