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धरती की वो जगह जहां मंगल ग्रह पर जाने की तैयारी करते हैं अंतरिक्षयात्री

Sat, 04 Jan 2020 05:45 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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लॉस वोल्केन्स नैचुरल पार्क - फोटो : Social media
लगभग हर हफ्ते में एक बार रात के नौ बजे लाखों तारों की रोशनी में राउल मार्टिनेज मोरालेस और अमांडा मैंड्री मंगल ग्रह का सर्वेक्षण करने की तैयारी करके निकलते हैं। राउल पूर्व खगोल भौतिकी वैज्ञानिक हैं और अमांडा को खगोलशास्त्र का जुनून है। लावा जमने से बनी चट्टानों को पार करके लाल रेत के टीलों तक पहुंचने से पहले वे सावधानी से अपने वैज्ञानिक उपकरणों को खोलना शुरू करते हैं। कई बार वे ज्वालामुखी के विशाल क्रेटर (जिसमें रॉकेट शिप भी समा जाए) के पास अपनी अस्थायी प्रयोगशाला बनाते हैं। अंधेरे में किसी पराये ग्रह की कोई चीज दिखने पर या उल्कापिंडों की बौछार होने पर या कोई नया तारा दिखने पर उनकी सरगर्मी बढ़ जाती है। मोरालेस का कहना है कि बचपन से ही वह दूसरे ग्रहों और दूसरी दुनिया के बारे में जानना चाहते थे। मंगल, बृहस्पति, शनि और चंद्रमा, ये सब उनको रोमांचित करते हैं। 
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लॉस वोल्केन्स नैचुरल पार्क - फोटो : Social media
मोरालेस के आसपास का पूरा परिदृश्य किसी अन्य ग्रह का लगता है, लेकिन वे लाल ग्रह पर नहीं हैं। असल से वे मंगल से 5.46 करोड़ किलोमीटर दूर कैनरी आइलैंड के लैंजारोट में लॉस वोल्केन्स नैचुरल पार्क में हैं। यह स्पेन का द्वीप है, अंतरिक्ष नहीं। मैंड्री और मोरालेस यहां कॉस्मॉस तारामंडल चलाते हैं। मैंड्री कहती हैं कि यह अद्भुत जगह है। यह किसी भी अन्य जगह की तुलना में अंतरिक्ष के ज्यादा करीब है। यहां की गुफाएं चांद और मंगल पर मिली गुफाओं से मिलती-जुलती हैं। लैंजारोट में चंद्रमा और मंगल की सतह से विचित्र समानताएं हैं। इन समानताओं ने ही इसे अंतरिक्ष अन्वेषण के सबसे महत्वपूर्ण अनुसंधान केंद्रों में से एक बना दिया है। 1993 में यहां यूनेस्को बायोस्फीयर रिजर्व खोला गया था। 
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लॉस वोल्केन्स नैचुरल पार्क - फोटो : Social media
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी इसका इस्तेमाल अंतरिक्षयात्रियों के प्रशिक्षण और मार्स रोवर के परीक्षण के लिए करती हैं। वैज्ञानिक यहां सुदूर अंतरिक्ष के परिदृश्य की कल्पना करते हैं और अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष के रोमांच के लिए तैयार करते हैं। यह द्वीप भौतिकी और भूगोल के नियमों को तोड़ता हुआ लगता है। 

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लॉस वोल्केन्स नैचुरल पार्क - फोटो : Social media
1730 से 1736 के बीच छह साल की अवधि में यहां कई ज्वालामुखी विस्फोट हुए थे। टिमानफया नेशनल पार्क में मोंटानास डेल फ़ुएगो के पास ज्वालामुखी से राख और लावा निकलने लगा था, जिसने द्वीप के एक चौथाई हिस्से को ढंक लिया था। ज्वालामुखी विस्फोटों के बाद यहां की जमीन को नया रूप और नया जीवन मिल गया। 
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लॉस वोल्केन्स नैचुरल पार्क - फोटो : Social media
लॉस वोल्केन्स नेचुरल पार्क और टिमानफया नेशनल पार्क चंद्रमा जैसी परिस्थितियों के लिए मशहूर हैं। यहां 100 से ज्यादा ज्वालमुखीय शंकु हैं। ज्वालामुखी के विशाल कटोरे, पत्थर बन चुके मैग्मा, लावा प्रवाह और रंगीन रेत 172 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं जो किसी अन्य ग्रह का आभास कराते हैं। यहां के वातावरण में भी एक भटकाव है। यहां की जमीन किसी अन्य ग्रह के रेगिस्तान जैसी लगती है, जहां समय रुका हुआ जान पड़ता है। 
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लॉस वोल्केन्स नैचुरल पार्क - फोटो : Social media
इस द्वीप का समुद्र तट भी दूसरे तटों से अलग है। ज्वालामुखी से निकला गर्म लावा यहां अटलांटिक महासागर के ठंडे पानी के संपर्क में आकर अचानक ठंडा हो गया है। मंगल परियोजना की पूर्व लीडर लोर्डाना बेसोन भविष्य के स्पेस मिशन को लैंजारोट तक लाने में मददगार रही हैं। वह अंतरिक्षयात्रियों को स्पेस मिशन के लिए बनाए गए रोबोट के साथ तालमेल बनाने का प्रशिक्षण देती हैं। 
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लॉस वोल्केन्स नैचुरल पार्क - फोटो : Social media
बेसोन ESA के पैंजिया प्रोग्राम की प्रतिनिधि हैं, जो अंतरिक्षयात्रियों को दूसरे ग्रहों पर जाकर शोध करने के लिए तैयार करने की दिशा में पहला कदम है। वह कहती हैं कि संक्षेप में कहें तो लैंजारोट चांद और मंगल के कई यथार्थवादी परिदृश्य उपलब्ध कराता है। अंतरिक्षयात्रियों को कार्य और परिचालन सिखाना आसान है, लेकिन उनको फील्ड साइंटिस्ट के रूप में तैयार करना आसान नहीं है। पैंजिया किसी भी पृष्ठभूमि के अंतरिक्षयात्रियों को ग्रह विज्ञान के संदर्भ में प्रभावी फील्ड जियोलॉजिस्ट और जियो-माइक्रोबायोलॉजिस्ट बनाने में मदद करता है। इसके कई फायदे हैं- अंतरिक्षयात्री भूवैज्ञानिक बनना सीखते हैं, वैज्ञानिक खोजबीन करते हैं और व्यावहारिक परिस्थितियों में काम करना सीखते हैं। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : nasa
2016 में शुरू होने के बाद पैंजिया परियोजना लगातार बड़ी हो रही है। 2018 में इसके 10वें ट्रेनिंग कैंप पैंजिया-X के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों ने लैंजारोट पर रोवर का परीक्षण किया, ड्रोन उड़ाए और 21 हजार साल पहले ज्वालामुखी फटने से बने छह किलोमीटर गहरे लावा ट्यूब में रोवर को चलाकर देखा। इसके अलावा, एक सप्ताह के दौरान पांच अलग-अलग जगहों पर चार अंतरिक्ष एजेंसियों के 50 वैज्ञानिकों ने एक दर्जन प्रयोग किए। प्रशिक्षण के दौरान स्पेस वॉक और सूक्ष्म जीवों की मौके पर डीएनए जांच सामान्य बातें थीं। जो इन सबसे अजनान थे, उनके लिए द्वीप पर स्टार ट्रेक और डिज्नी-पिक्सर की फिल्म वॉल-ई के सेट जीवंत हो उठे थे। लैंजारोट की इस दुनिया पर जिनकी रोजी-रोटी टिकी है, वे इससे वाकिफ हैं। 

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लॉस वोल्केन्स नैचुरल पार्क - फोटो : Social media
ग्रेवीमीटर, सिस्मोग्राफ, जियोडेटिक उपकरण और मैग्नोमीटर यहां के लिए सामान्य उपकरण हैं। ऐसे उपकरण टिमानफया नेशनल पार्क के विजिटर्स सेंटर में प्रदर्शित किए गए हैं। ज्वालामुखी का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने यहां की जमीन और दशकों पहले हुए ज्वालामुखी विस्फोट का अध्ययन करने के लिए इनका इस्तेमाल किया था। अब थ्री-डी मैपिंग लेजर और हाई-टेक स्कैनर का प्रयोग होता है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : nasa
पैंजिया के हाल के एक परीक्षण में अंतरिक्षयात्रियों ने अपोलो मिशन के लिए बनाए गए भूवैज्ञानिक उपकरणों की मदद से चट्टानों के नमूने एकत्र किए। उन्होंने वैज्ञानिकों के साथ संवाद किया और इलेक्ट्रॉनिक फील्ड बुक का इस्तेमाल करके अपने यात्रा-वृतांत दर्ज किए। यह पूरा ऑपरेशन मिशन कंट्रोल के फ्लाइट डायरेक्टर ने निदेशित किया। एक अन्य असाइनमेंट में हैम्बर्ग के रिमोट कंट्रोल सेंटर से संचालित मार्स रोवर को लैंजारोट में चलाकर देखा गया। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File photo
बेसोन कहती हैं कि लैंजारोट जैसी जगह पर ऐसी स्थितियां बनाकर परीक्षण किया जा सकता है, लेकिन दूसरे ग्रह की असली सतह पर होने की नकल करना असंभव है। उन्होंने कॉनकोर्डिया स्टेशन के लिए अंटार्कटिक ओवरविंटर चालक दल के सदस्यों को भी प्रशिक्षित किया है, जिनको 'व्हाइट मार्स' के नाम से भी जाना जाता है। वह कहती हैं कि अंतरिक्ष में कई बाधाएं होती हैं। भौगोलिक क्षेत्र की मुश्किलें होती हैं, रोशनी की समस्या होती है, संचार और पहुंच की समस्या होती है। अंतरिक्ष में थोड़े समय के लिए जाना भी बैले डांस की तरह होता है। प्रभावी होने के लिए इसकी कोरियोग्राफी और इसका रिहर्सल अच्छे से होना चाहिए। 
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चांद की सतह पर इंसान के पैर के निशान - फोटो : Social media
पहले अंतरिक्ष यात्री अपने देश का झंडा फहराने के लिए अंतरिक्ष में जाते थे। अब वह बात नहीं है। आज के वैज्ञानिकों का मकसद दूसरा है। वे अंतरिक्ष की समझ बढ़ाने के लिए जाते हैं और उस विज्ञान का इस्तेमाल धरती पर जिंदगी को बेहतर बनाने में कैसे किया जा सकता है, इसका पता लगाते हैं। यही कारण है कि मंगल ग्रह पर जाना नासा और यूरोपियन स्पेस एजेंसी दोनों के लिए अहम लक्ष्य बना हुआ है। बेसोन कहती हैं कि यहां परीक्षण करके यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने कई गलतियों का पता लगाया है जो हम अंतरिक्ष में नहीं दुहराना चाहेंगे। आप वहां नहीं जाना चाहेंगे जब तक आपको यह पता न हो कि आपके अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए सब कुछ किया गया है। नासा ने 2024 में चंद्रमा की सतह पर फिर से जाने की योजना बनाई है। मैं कह सकती हूं कि हम समय से हैं। 
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