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खुफिया कोड बताने वाला वो 'भूतिया' रेडियो स्टेशन, जहां से आती हैं रहस्यमय आवाजें

Fri, 13 Dec 2019 10:21 AM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
जासूसी करने के भी अजब-गजब तरीके होते हैं। खुफिया कोड, बनावटी बातें, खास जबान, चेहरे पर चेहरा, हनीट्रैप वगैरह वगैरह...। कुल मिलाकर खुफियागिरी या जासूसी आम तौर पर लोगों की नजरें बचाकर, छुप-छुपाकर की जाती है, ताकि दुश्मन की नजर ना पड़े। कोई जान न जाए। लेकिन आप ने कभी नहीं सुना होगा कि कोई देश रेडियो स्टेशन से जासूसी करता है और वो भी खुलेआम, पूरी दिलेरी से। नहीं सुना, तो चलिए आपको एक ऐसे रेडियो स्टेशन का किस्सा सुनाते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
ये रेडियो स्टेशन रूस के सेंट पीटर्सबर्ग शहर से कुछ दूर पर सुनसान इलाके में है। रेडियो स्टेशन से नियमित अंतराल पर कुछ प्रसारण होता है। इसके बाद जैसे किसी रेडियो स्टेशन से प्रसारण बंद हो जाता है, ठीक उसी तरह इस स्टेशन से भी भनभनाहट सुनाई देती रहती है। इस रेडियो स्टेशन का ऐसा अजीबो-गरीब प्रसारण पिछले कई दशकों से जारी है। कुछ आवाजें और फिर वही भनभनाहट।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दिलचस्प बात ये है कि दुनियाभर में ये रेडियो स्टेशन सुना जाता है, पर किसी को नहीं मालूम कि ये रेडियो स्टेशन कौन चला रहा है। किसी भी रिकॉर्ड में ये रेडियो स्टेशन नहीं दर्ज है। रूस की सरकार इसकी मौजूदगी से अनजान बनती है। अब ऐसे रहस्यमयी स्टेशन का नाम भी अजीबो-गरीब होना तय है। तो, इस रेडियो स्टेशन का नाम है MDZhB। पश्चिमी देशों में इसे 'द बजर' के नाम से जाना जाता है। पिछले करीब 35 साल से ये रेडियो स्टेशन विचित्र आवाजें दुनिया को सुना रहा है, लेकिन कोई अब तक इसका मकसद डिकोड नहीं कर पाया है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
इस रेडियो स्टेशन पर दुनिया की नजर पड़ने की वजह एक अजीब सा रूटीन है। हफ्ते में एक या दो बार कोई मर्द या औरत इस स्टेशन पर कुछ शब्द बोलते हैं, जैसे कि डिंगी या किसानी के विशेषज्ञ। बस, इसके बाद रेडियो स्टेशन की फ्रीक्वेंसी पर वही भनभनाहट सुनाई देती है। ये रेडियो स्टेशन शॉर्ट वेव पर प्रसारित होता है। इसी वजह से ये दुनियाभर में सुना जाता है। इस रेडियो स्टेशन के अजीब प्रसारण की वजह से ही इसे लेकर तमाम तरह के किस्से दुनिया भर में प्रचलित हो चले हैं। इसी तरह के दो और रेडियो स्टेशन हैं। ऐसे अजीब रेडियो सुनने के शौकीन लोग इन्हें 'द पिप' और 'स्क्वीकी व्हील' के नाम से बुलाते हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
ऑनलाइन दुनिया में इन तरह के रहस्यमयी रेडियो स्टेशनों के तमाम चाहने वाले हैं। वो नियमित रूप से इनका प्रसारण या इनकी भनभनाहट सुनते हैं। लंदन की सिटी यूनिवर्सिटी के सिग्नल स्पेशलिस्ट डेविड स्टपल्स कहते हैं कि इन रेडियो स्टेशनों का मकसद अब तक डिकोड नहीं हो सका। रेडियो स्टेशन की फ्रीक्वेंसी की बुनियाद पर पश्चिमी देश ये मानते हैं कि ये रूसी सेना से ताल्लुक रखता है। इसका प्रसारण शीत युद्ध के आखिरी दिनों में शुरू हुआ था। आज 'द बजर' रेडियो स्टेशन का प्रसारण सेंट पीटर्सबर्ग और मॉस्को से होता है। सोवियत संघ के विघटन के बाद रेडियो के प्रसारण में कमी आने के उलट तेजी आ गई है।  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
रेडियो स्टेशन से सीधे-सादे कार्यक्रम या खबरें प्रसारित न होने की वजह से इनके बारे में तमाम अटकलें लगाई जाती हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इनकी मदद से रूसी सेना अपनी पनडुब्बियों से संपर्क करती है। वहीं कुछ लोग ये कहते हैं कि इनसे रूस एलियन से संपर्क करता है। वहीं कुछ लोग ये कहते हैं कि रूस पर एटमी हमला होने की सूरत में इस रेडियो स्टेशन का प्रसारण खुद-ब-खुद बंद हो जाएगा। इसका मतलब ये होगा कि रूस की तरफ से दुश्मन पर जवाबी हमला होगा। यानी रूस अपने दुश्मन को बिना कोई हरकत किए हुए तबाह कर देगा। वैसे ये अटकल गलत सही भी हो सकती है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
सोवियत संघ के जमाने में ही एक ऐसा सिस्टम विकसित किया गया था, जिसमें कंप्यूटर के जरिए हवा में तरंगें सुनी जाती थीं। ये तरंगें धरती से बाहर दुनिया की तलाश करती थीं। या फिर एटमी हमले की सूरत में देश को एलर्ट करने के काम आती थीं। पश्चिमी देशों के जानकार मानते हैं कि सोवियत संघ के जमाने की ये तकनीक रूस आज भी इस्तेमाल कर रहा है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी कहा था कि एटमी जंग की सूरत में कोई नहीं बचेगा। तो क्या 'द बजर' रूस पर परमाणु हमले की सूरत में अपनी एजेंसियों को पलटवार का फरमान देने के लिए चलाया जा रहा है?

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दुनिया भर में इंटरनेशनल रेडियो स्टेशन शॉर्टवेव पर चलाए जाते हैं। ये सिग्नल मीडियम वेव के मुकाबले ज्यादा दूर तक जाते हैं और सुने जा सकते हैं। इनके मुकाबले टीवी, मोबाइल और लोकल रेडियो स्टेशन के सिग्नल छोटे से इलाके तक ही पहुंच पाते हैं। शॉर्टवेव सिग्नल की इन्हीं खूबियों की वजह से इन्हें समंदर में चलने वाले जहाज, हवाई जहाज और तमाम देशों की सेनाएं संदेश भेजने और सुनने के लिए इस्तेमाल करती हैं, क्योंकि ये नदी-नाले ही नहीं, ऊंचे पर्वत, गहरे समंदर और हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके अपनी मंजिल तक पहुंच जाती हैं। 

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डेविड स्टपल्स कहते हैं कि इन रेडियो तरंगों की मदद से हो सकता है कि रूस अपनी आसमानी सरहदों की निगरानी करता हो, ताकि कहीं और से आ रही मिसाइल का पता लगाकर उसे गिरने से पहले ही तबाह कर सके। 

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ऐसा ही रहस्यमय रेडियो स्टेशन सत्तर के दशक से 2008 तक प्रसारित हुआ करता था। इसका नाम था 'लिंकनशायर पोचर'। ये रेडियो स्टेशन कहां से चलता था, किसी को नहीं पता। कहा जाता है कि ये भूमध्य सागर स्थित साइप्रस से चलाया जाता था। इस रेडियो स्टेशन से भी अजीब सा प्रसारण होता था। इसमें एक अंग्रेजी का लोकगीत प्रसारित किया जाता था। ऐसा हर घंटे की शुरुआत में होता था। इस गीत को लगातार 12 बार प्रसारित करने के बाद, रेडियो स्टेशन पर एक महिला की आवाज सुनाई देती थी। ये महिला कुछ ऊटपटांग नंबर बोला करती थी। 

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ऐसे अजब-गजब रेडियो स्टेशन का राज समझने के लिए हमें बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में जाना होगा। उस वक्त सोवियत संघ और ब्रिटेन के बीच कारोबार के लिए ऑल रशियन को-ऑपरेटिव सोसाइटी (आर्कोस) बनाई गई थी। आर्कोस का मकसद सोवियत संघ और ब्रिटेन के कारोबारी ताल्लुक को बेहतर करना था। कम से कम ऊपरी तौर पर ये संस्था तो यही मकसद बताती थी, लेकिन बाद में पता चला कि इसके जरिए सोवियत संघ ब्रिटेन की जासूसी करता था। 

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सबसे दिलचस्प बात ये कि ब्रिटिश खुफिया एजेंसी MI5 को इनकी करतूतों के बारे में पता था। असल में तो जब आर्कोस के ठिकाने पर 1927 में छापे पड़े, तो सोवियत संघ को पता चला कि उनकी जासूसी की हर बात से ब्रिटेन वाकिफ था। सोवियत संघ ने हालात से निपटने के लिए कोडेड मैसेज भेजने का नया नुस्खा निकाला। कुछ शब्दों या आवाजों के जरिए जासूसी की जाने लगी। ब्रिटेन ने इसका भी पता लगा लिया बाद में ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने रूस को इन खुफिया संदेशों के मामले में भी मात दे दी।

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दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पूर्वी जर्मनी में तैनात ब्रिटिश जासूसों को पता चला कि रूसी सेना, वहां अस्पतालों के टॉयलेट पेपर के जरिए खुफिया संदेश भेजा करती है। इसी के बाद रेडियो स्टेशन के जरिए कोडेड मैसेज भेजने का सिलसिला शुरू किया। सोवियत संघ और उसके साथी देशों ने इसकी शुरुआत की थी। बाद में अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे कई देशों ने भी रेडियो स्टेशन के जरिए खुफियागीरी शुरू कर दी। 'लिंकनशायर पोचर', 'नैंसी एडम सूजन', 'रशियन काउंटिंग मैन', और 'चेरी राइप' जैसे नामों वाले रेडियो स्टेशनों की एक दौर में स्थापना की गई थी। रूस का 'द बजर' रेडियो स्टेशन इसी सिलसिले की कड़ी माना जाता है। 

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2010 में अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई ने पूरे अमेरिका में रूसी एजेंट गिरफ्तार किए थे। एफबीआई का दावा था कि उसने अमेरिका भर में फैले रूस के जासूसी के जाल को तहस-नहस कर दिया है। ऐसा माना जाता है कि अमेरिका में इन रूसी एजेंटों को रेडियो की शॉर्टवेव 7887 किलोहर्ट्ज के ज़रिए मॉस्को से निर्देश मिला करते थे।  2017 के अप्रैल में उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग से भी ऐसा ही अजीबो-गरीब प्रसारण होते सुना गया था। इसकी भाषा से साफ लगा कि उत्तर कोरिया अपने जासूसों को कोई निर्देश खुलेआम पहुंचा रहा है। 

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ऐसे रेडियो स्टेशन को भले ही सारी दुनिया सुन सकती है। मगर इससे प्रसारित होने वाले संदेशों को डिकोड करना बेहद मुश्किल होता है। जैसे मॉस्को से प्रसारित होने वाला 'द बजर'। हफ्ते में दो या तीन बार महिला अनाउंसर कुछ रूसी शब्द बोलती है। अब इन शब्दों में क्या संदेश छुपा है, ये बात तो रूसी एजेंट ही जानते हैं। हां, रेडियो के जरिए ये संदेश पूरी दुनिया के सामने खुफिया तौर पर एजेंटों तक पहुंचा दिए जाते हैं। 

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'द बजर' से कभी भी कोड नंबर प्रसारित नहीं होता। जानकार मानते हैं कि रेडियो स्टेशन से आने वाली भनभनाहट मानो पूरी दुनिया को ये बताती है कि ये फ्रीक्वेंसी मेरी है। खबरदार! इसका कोई भी इस्तेमाल न करे। हो सकता है कि इस रेडियो स्टेशन को किसी आफत की सूरत में इस्तेमाल के लिए ही चालू किया जाएगा। जैसे कभी रूस पर हमला हो जाए। तब हो सकता है कि रेडियो संदेश के जरिए पूरी दुनिया में फैले रूसी जासूसों को संदेश भेजा जाए। आखिर रूस इतना बड़ा देश जो है और इसका जासूसी का नेटवर्क भी बहुत बड़ा है। ऐसे में रेडियो प्रसारण के जरिए रूसी एजेंटो तक एक ही बार में पहुंचा जा सकता है। 
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2013 में इस रेडियो स्टेशन से एक संदेश प्रसारित हुआ था। इसमें कहा गया था, 'कमांड 135 जारी किया जाता है'। शायद रूसी सरकार ने अपने एजेंटों को पूरी तरह अलर्ट रहने का संदेश जारी किया था। हो सकता है कि पश्चिमी देशों की खुफिया एजेंसियों को इस रेडियो स्टेशन का असल राज पता भी हो। मगर, अभी आम लोगों की नजर में ये भूतिया रेडियो स्टेशन ही है।
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