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4000 साल पुराना वो रहस्यमय चक्र, जिसकी गुत्थी आज तक है अनसुलझी

Thu, 16 Apr 2020 07:27 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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फैसटॉस डिस्क - फोटो : Social media
कभी-कभी खोजबीन के दौरान वैज्ञानिकों को ऐसी चीजें मिल जाती हैं, जिनके रहस्य को सुलझाना उनके लिए भी नामुमकिन सा लगने लगता है। आज से 112 साल पहले कुछ ऐसा ही हुआ था। एक प्राचीन महल के भग्नावशेष की खुदाई के दौरान पुरातत्ववेत्ताओं को एक रहस्यमय चक्र मिला, जिसने सभी को हैरान कर दिया। उस चक्र पर कुछ ऐसे अभिलेख लिखे हुए हैं, जिसे पढ़ने में आज तक कोई भी सफल नहीं हो पाया है या यूं कहें कि दुनियाभर के वैज्ञानिक इसे डिकोड करने में फेल साबित हुए हैं। 
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क्रीट द्वीप - फोटो : Social media
इस रहस्यमय चक्र को 'फैसटॉस डिस्क' के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यह क्रीट टापू के फैसटॉस नामक जगह पर मिला था। इस डिस्क की जब कार्बन डेटिंग की गई तो पता चला कि इसे ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी (हजार वर्ष) से भी पहले बनाया गया था। यह डिस्क तपायी हुई सख्त मिट्टी से बनी हुई है। 
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मिनोअन सभ्यता के महल के भग्नावशेष - फोटो : Social media
यूनानी सभ्यता में रूचि रखने वाले इटैलियन पुरातत्ववेत्ता लुइगी पर्निएर ने साल 1908 में 'फैसटॉस डिस्क' की खोज की थी। दरअसल, वो और उनकी टीम मिनोअन सभ्यता के उस राजमहल के भग्नावशेष की खुदाई का काम रही थी, जो प्राचीन काल में आए किसी भूकंप या फिर ज्वालामुखीय विस्फोट से धराशायी हो गया था और धरती के अंदर समा गया था। महल के तहखाने में एक दीवार को जब तोड़ा गया तो अंदर एक बड़ा सा कमरा दिखाई दिया, जिसमें बहुत सारी चीजें इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं।

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फैसटॉस डिस्क - फोटो : Social media
पर्निएर जैसे ही उस कमरे में घुसे, उनकी नजर एक गोल डिस्क पर जाकर टिक गई। पर्निएर ने जब उस डिस्क को उठाया तो देखा कि उसपर चित्र लिपि में कुछ भी समझ न आने वाली चीजें लिखी हुई हैं। अब उस डिस्क में क्या लिखा है, यह आज भी एक रहस्य ही बना हुआ है।   
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फैसटॉस डिस्क - फोटो : Social media
सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि 15 सेंटीमीटर व्यास वाली इस डिस्क के दोनों तरफ सर्पिलाकार खांचे बने हैं, जिसमें अनसुलझी चित्र लिपि लिखी हुई है। अब इसमें सोचने वाली बात ये है कि इस तरह के स्वरूप मिनोअन काल की अन्य रचनाओं से मेल नहीं खाते हैं। इस विषय में कुछ विद्वानों का मानना है कि 'फैसटॉस डिस्क' एक जालसाजी या धोखा है, जिसे लुइगी पर्निएर ने ही रचा था। हालांकि सभी लोग इससे सहमत नहीं हैं। पुरातत्वविदों द्वारा इसे प्रामाणिक रूप से स्वीकार किया गया है।   
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