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जहरीले रेगिस्तान से घिरा एक ऐसा खतरनाक आइलैंड, जहां जाने से कतराते हैं लोग

Fri, 13 Dec 2019 01:55 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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वोजरोझडेनीया द्वीप - फोटो : vk.com/ninurta
मध्य एशिया में कजाखस्तान-उज्बेकिस्तान की सीमा पर एक छोटा सा द्वीप है। ये चारों तरफ से जहरीले रेगिस्तान से घिरा हुआ है। अब इसे द्वीप कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इसके आस-पास की झील यानी अराल सागर अब कमोबेश सूख चुकी है। इस द्वीप का नाम वोजरोझडेनीया है। किसी दौर में ये मछली मारने का बहुत बड़ा ठिकाना था। ये उस वक्त की बात है जब अराल सागर दुनिया की चौथी बड़ी झील हुआ करती थी। लेकिन सोवियत संघ ने इस झील का इतना दुरुपयोग किया कि आज ये झील सूख चुकी है। इस वजह से वोजरोझडेनीया से भी जजीरा होने का खिताब छिन गया है। इस झील तक पानी लाने वाली नदियों का रुख खेतों की सिंचाई के लिए मोड़ दिया गया था। इसी वजह से अराल सागर सूख गया। 
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वोजरोझडेनीया द्वीप - फोटो : Social media
आज ये जगह कीटनाशकों का ढेर है। यहां पर पारा अक्सर 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। जिंदगी के निशान के तौर पर यहां सिर्फ सूखे हुए दरख्त दिखते हैं। कभी-कभार यहां पर सुस्ताते हुए ऊंट भी दिख जाते हैं, जो किसी जमाने में यहां चलने वाले बड़े जहाजों की छांव में बैठते हैं। वोजरोझडेनीया द्वीप ने अराल सागर का पानी इतना सोख लिया है कि इसका आकार दस गुना तक बढ़ गया है। 
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वोजरोझडेनीया द्वीप - फोटो : Social media
आज की तारीख में वोजरोझडेनीया को दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों में गिना जाता है। एक दौर में यहां पर सोवियत संघ का जैवीय युद्ध की तैयारी का ठिकाना हुआ करता था। सत्तर के दशक से यहां कई भयानक घटनाएं घट चुकी हैं। जैसे कि 1971 में एक वैज्ञानिक बीमार पड़ गई। उसे चेचक की बीमारी हुई थी। उसे चेचक का टीका लगा हुआ था, तब भी वो बीमार पड़ गई। बाद में वो ठीक हो गई, लेकिन चेचक की वजह से उसके भाई समेत तीन और लोगों की मौत हो गई। इस घटना के ठीक एक साल बाद दो लापता लोग एक नाव में मरे हुए पाए गए। कहा जाता है कि उन्हें प्लेग की बीमारी ने मार डाला। इसके बाद पूरे इलाके में बड़ी तादाद में मरी हुई मछलियां पकड़ी जाने लगीं। मई 1988 में 50 हजार के आसपास बारहसिंघे रहस्यमय तरीके से मर गए। इन सब की मौत एक घंटे के अंदर हो गई थी। 

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वोजरोझडेनीया द्वीप - फोटो : Social media
सोवियत संघ के विघटन के बाद यानी 90 के दशक से वोजरोझडेनीया वीरान पड़ा है। इस द्वीप के बारे में ब्रिटिश पत्रकार निक मिडलटन ने 2005 में एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी। निक बताते हैं कि वो एक ब्रिटिश सैन्य जासूस की मदद से इस इलाके में पहुंचे थे। यहां के बारे में कहा जाता था कि सोवियत दौर में यहां जैविक युद्ध के बहुत से तजुर्बे किए गए थे। बहुत से जानलेवा बीमारियों की जड़ समझे जाने वाले बैक्टीरिया यहां पर जमा किए गए थे। निक ने बताया कि वो मास्क, रबर बूट और ऑक्सिजन टैंक जैसे बहुत से एहतियात लेकर वोजरोझडेनीया द्वीप पहुंचे थे। 
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वोजरोझडेनीया द्वीप - फोटो : Social media
पश्चिमी देशों को यहां चल रहे रिसर्च के बारे में मालूम था। 1962 के दशक में सीआईए ने हवाई जहाज से इस इलाके की तस्वीरें ली थीं। इन तस्वीरों में इस वीरान इलाके में बने फायरिंग रेंज से लेकर बहुमंजिला इमारतें तक, साफ दिखती थीं। वोजरोझडेनीया को सोवियत संघ ने सैन्य अड्डा बना लिया था। यहां जैविक हथियारों का परीक्षण किया जाता था। हालांकि सोवियत संघ का ये प्रोजेक्ट बेहद खुफिया था। सोवियत संघ के किसी भी नक्शे में इसका जिक्र नहीं मिलता। जिन लोगों को इसके बारे में पता था, वो इसे इसके कोड नेम अर्लास्क-7 के नाम से जानते थे। 
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वोजरोझडेनीया द्वीप - फोटो : Social media
एक बार यहां पर एंथ्रैक्स बीमारी के कीटाणुओं की बड़ी खेप लाई गई थी। इसके अलावा चेचक और प्लेग के बैक्टीरिया भी यहां जमा किए गए थे। इसके अलावा कई बहुत सी भयंकर मगर बहुत कम होने वाली बीमारियों के विषाणु भी वोजरोझडेनीया में जमा किए गए थे। इन में से कई बीमारियों के तो लोगों ने नाम भी नहीं सुने होंगे, जैसे टुलारेमिया, ब्रूसेलोसिस और टाइफस। इतनी बड़ी तादाद में ये विषाणु जमा होने की वजह से पूरा का पूरा वोजरोझडेनीया द्वीप जहरीला हो गया है।
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वोजरोझडेनीया द्वीप - फोटो : Social media
एक दौर में ये द्वीप इतना छुपा हुआ था कि इसकी तलाश ही उन्नीसवीं सदी में हुई थी। इसी वजह से इसे सोवियत संघ ने खुफिया रिसर्च का अड्डा बनाया। आसपास आसानी से उपलब्ध पानी की वजह से वोजरोझडेनीया द्वीप खतरनाक रिसर्च के लिए बेहद मुफीद था। आबादी कम होने से इंसानों को नुकसान होने का डर भी कम था। इसी वजह से एक बार सोवियत संघ ने एंथ्रैक्स के बैक्टीरिया की सबसे बड़ी खेप को यहां जमीन में दबाने का फैसला किया। ये खेप रूस के शहर येकाटेरिनबर्ग में तैयार की गई थी। बाद में इसे वोजरोझडेनीया लाया गया। 

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वोजरोझडेनीया द्वीप - फोटो : Social media
वोजरोझडेनीया पर एक वक्त में 50 हजार से ज्यादा लोग काम किया करते थे। इन का काम खतरनाक जैविक हथियार तैयार करना था। 1998 में एंथ्रैक्स लीक होने से 105 लोग मारे गए थे। इसके बाद सोवियत सरकार ने एंथ्रैक्स के सारे बैक्टीरिया के खात्मे का फैसला किया। इन्हें वोजरोझडेनीया के पास जमीन में बहुत नीचे दफ्न कर दिया गया। ये तादाद 100 से 200 टन के आस-पास थी। इन्हें गड्ढों में दबाकर लोग भूल गए। मगर दिक्कत ये है कि एंथ्रैक्स के बैक्टीरिया स्पोर के तौर पर जिंदा रहते हैं और मौका पाते ही वार करते हैं। तो इनसे इंसानियत को खतरा मंडरा रहा था। जमीन में दबे होने के बावजूद ये सैकड़ों साल तक जिंदा रह सकते हैं। कहीं गलती से भी इन्हें खोल दिया जाए, तो ये भयंकर तबाही मचा सकते हैं।

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वोजरोझडेनीया द्वीप - फोटो : Social media
2017 में रूस में 12 साल के एक बच्चे की एंथ्रैक्स से मौत हो गई थी। रूस के नेनेत्स नाम के आदिवासी भी इसके शिकार हुए थे। 41 बच्चों समेत कुल 72 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। कहा जाता है कि एंथ्रैक्स का ये हमला 75 साल पुराने रेंडियर के कंकाल से हुआ था। इसीलिए अमेरिकी सरकार ने 60 लाख डॉलर की रक़म खर्च करके वोजरोझडेनीया के पास दफ्न एंथ्रैक्स के ऊपर एक और परत चढ़ाकर उसे सील कराया। ऐसा करने से पहले पूरे इलाके को बहुत गर्म किया गया, ताकि एंथ्रैक्स के कीटाणु मर जाएं। 

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ग्रुइनार्ड द्वीप - फोटो : Social media
ब्रिटेन के वैज्ञानिक लेस बेली कहते हैं कि अभी भी दुनिया के कई हिस्सों में एंथ्रैक्स के कीटाणु हो सकते हैं। इनमें से एक ठिकाना तो ब्रिटेन का पोर्टन डाउन भी हो सकता है। यहां पर ब्रिटेन अपने जैविक हथियारों का निर्माण किया करता था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने स्कॉटलैंड के द्वीप ग्रुइनार्ड पर एंथ्रैक्स बम गिराकर इनका परीक्षण किया था। हालांकि 1943 के बाद ब्रिटेन ने ये कार्यक्रम बंद कर दिया था, लेकिन 1979 में जांच के दौरान पता चला कि पूरे ग्रुइनार्ड द्वीप पर तीन से 45 हजार बैक्टीरिया स्पोर हर एक ग्राम मिट्टी में मौजूद थे। इससे निपटने के लिए कभी तो एक कंक्रीट की दीवार, द्वीप के चारों तरफ बनाने की बात हुई, तो कभी इसकी मिट्टी की ऊपरी परत निकालकर समंदर में फेंक देने का प्रस्ताव रखा गया। आखिर में इस द्वीप पर 280 टन फॉर्मेल्डिहाइड नाम का केमिकल छिड़क कर एंथ्रैक्स के स्पोर को खत्म किया गया। आज ग्रुइनार्ड द्वीप पर जाने की किसी को मनाही नहीं है, फिर भी वहां कोई नहीं जाता। 

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वोजरोझडेनीया द्वीप - फोटो : Social media
अच्छी बात ये है कि वोजरोझडेनीया द्वीप पर जाना इतना आसान नहीं। वहां जाने के लिए आप को पहले कजाखिस्तान जाना होगा। फिर नाव किराए पर लेकर अराल सागर पार करना होगा। साथ में कोई स्थानीय गाइड ले जाना भी जरूरी है। स्थानीय लोग वोजरोझडेनीया द्वीप जाने से कतराते हैं। उन्हें वहां जाने के खतरों के बारे में पता है। ब्रिटिश पत्रकार निक मिडिलटन भी बमुश्किल इस द्वीप तक पहुंच पाए थे। ये ठिकाना दो हिस्सों में बंटा है। पहला है कांटुबेक नाम का कस्बा, जो वैज्ञानिकों और उनके परिजनों के रहने के लिए बसाया गया था। वहां से करीब सवा तीन किलोमीटर दूर वो जगह है जहां पर तमाम प्रयोगशालाएं बनाई गई थीं। जो लोग निक मिडिलटन और उनके ब्रिटिश जासूस साथी बटलर को लेकर आए थे, वो इस जगह को लूटने के इरादे से आए थे। तांबे के तार, बिजली का सामान वगैरह। वो पहले भी ये सामान यहां से चुरा ले जा चुके थे। वहीं निक और उनके साथी पूरी तरह से सुरक्षा के लबादे में कैद थे। 

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वोजरोझडेनीया द्वीप - फोटो : Social media
आज कांटुबेक कस्बा पूरी तरह से भुतहे शहर में तब्दील हो गया है, लेकिन किसी दौर में यहां रहने वालों के निशान आज भी मिलते हैं। मकान, स्कूल, कैंटीन, मार्क्स और लेनिन की किताबें, सोवियत नेताओं के बुत। सब धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो रहा है। यहां पर आपको न तो एक भी परिंदा दिखेगा और न ही एक भी कीड़ा। पूरे इलाके में सन्नाटे की चीख सुनाई पड़ती है। जो स्थानीय लोग निक और बटलर के साथ आए थे, वो सामान लूटकर जल्द से जल्द निकलना चाहते थे। निक बताते हैं कि लैब आज भी वैसे ही खुली पड़ी हैं। यहां पर जो जहरीले केमिकल थे, न तो उन्हें हटाया गया और न ही दबाकर रखा गया। ऐसे में प्रयोगशालाओं के भीतर जाना बेहद खतरनाक था। यहां पर मास्क, सांस लेने की नली, पूरे शरीर को ढंकने वाले लबादे पड़े मिले। पंद्रह मिनट के अंदर ही बटलर और निक के एयर फिल्टरों ने काम करना बंद कर दिया था। यानी हवा इतनी जहरीली थी कि फिल्टर उन्हें छान नहीं पा रहे थे। इसलिए निक और बटलर दोनों ही वहां से जल्दी से जल्दी भाग निकलना चाहते थे, वरना उनकी जान को भी खतरा हो सकता था। 

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एंथ्रेक्स वायरस - फोटो : Social media
अर्लास्क-7 प्रोजेक्ट, सोवियत संघ ने ब्रिटेन और अमेरिका से होड़ लेने के लिए शुरू किया था। जंगली इलाकों से भयंकर बीमारियों के जीवाणु यहां लाकर जमा किए गए थे। हालांकि 1972 में तीनों देशों ने आपस में समझौता करके जैविक हथियारों से तौबा कर ली थी। वोजरोझडेनीया में सोवियत संघ ने एंथ्रैक्स बैक्टीरिया की जो किस्म तैयार की थी, उस पर किसी भी एंटीबायोटिक का असर नहीं होता था। इसे दुनिया एसटीआई के नाम से जानती थी। 
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वोजरोझडेनीया द्वीप - फोटो : Social media
सोवियत वैज्ञानिकों ने यहां एंथ्रैक्स की जो किस्म तैयार की थी, वो भारत के एक आदमी के जरिए 1967 में मॉस्को पहुंची थी। इस शख्स के अंदर जो बैक्टीरिया पाया गया था उस पर किसी टीके का भी असर नहीं होता। यही एंथ्रैक्स 1988 में एक वैज्ञानिक के बीमार होने की वजह बना था। वैज्ञानिक मानते हैं कि अब वोजरोझडेनीया से एंथ्रैक्स के फैलने का खतरा खत्म हो चुका है। हालांकि प्लेग के बैक्टीरिया अभी भी पूर्व सोवियत गणराज्यों में मौजूद हैं। वोजरोझडेनीया का मतलब होता है पुनर्जन्म। दुनिया ये दुआ करती है कि वोजरोझडेनीया में दफ्न किए गए एंथ्रैक्स के बैक्टीरिया को पुनर्जन्म नसीब न हो। 
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