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धरती पर रहते हैं डायनासोर से भी पुराने जीव, 11 लाख में बिकता है इनका एक लीटर खून

Thu, 12 Mar 2020 02:49 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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डायनासोर से भी पुराने हैं ये जीव - फोटो : Social media
दुनिया में कई लोग ये बात नहीं जानते कि उनकी सेहत एक नीले खून वाले केकड़े पर निर्भर हो सकती है जो कि एक मकड़ी और विशाल आकार के जूं जैसे जीव के बीच की प्रजाति होती है। हॉर्स शू केकड़े दुनिया के सबसे पुराने जीवों में से एक हैं। ये जीव पृथ्वी पर डायनासोरों से भी पुराने हैं और इस ग्रह पर कम से कम 45 करोड़ सालों से हैं। 
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हॉर्स शू केकड़े - फोटो : Social media
अटलांटिक हॉर्स शू केकड़े बसंत ऋतु से मई-जून के महीने में पूर्णिमा के आसपास ज्वार (हाई टाइड) के दौरान देखा जा सकता है। इस मामले में हम खुशकिस्मत हैं कि ये जीवित जीवाश्म आज भी अटलांटिक, हिंद और प्रशांत महासागर में देखे जा सकते हैं और इस जीव ने अब तक लाखों जिंदगियों को बचाया है। 
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हॉर्स शू केकड़े - फोटो : Social media
साल 1970 से वैज्ञानिक इस जीव के खून के इस्तेमाल से मेडिकल उपकरणों और दवाओं के जीवाणु रहित होने की जांच करते हैं। मेडिकल उपकरणों पर खतरनाक जीवाणु की मौजूदगी मरीज की जान ले सकती है, लेकिन इस जीव का खून जैविक जहर के प्रति अति संवेदनशील है। इस खून का इस्तेमाल इंसानी शरीर के अंदर जाने वाले किसी भी सामान के निर्माण के दौरान उसके प्रदूषक होने के बारे में जांचा जाता है। इन चीजों में आईवी और टीकाकरण के लिए उपयोग में लाई जाने वाली मेडिकल डिवाइसें शामिल हैं।  

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हॉर्स शू केकड़े का खून - फोटो : Social media
अटलांटिक स्टेट्स मरीन फिशरीज कमीशन के मुताबिक, हर साल लगभग पांच करोड़ अटलांटिक हॉर्स शू केकड़े को जैव चिकित्सकीय इस्तेमाल के लिए पकड़ा जाता है। इनका खून दुनिया का सबसे महंगा तरल पदार्थ है। इसके एक लीटर की कीमत 11 लाख रुपये हो सकती है।  
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हॉर्स शू केकड़े का खून - फोटो : Social media
इस जीव के खून का रंग नीला इसलिए होता है क्योंकि इसके खून में तांबा मौजूद होता है। वहीं, इंसानी खून में लोहे के अणु होते हैं जिसकी वजह से इंसानी खून का रंग लाल होता है। लेकिन वैज्ञानिक इस जीव के खून के नीले रंग की वजह से इसमें रुचि नहीं दिखाते हैं। इस जीव के खून में एक खास रसायन होता है जोकि बैक्टीरिया के आसपास जमा होकर उसे कैद कर देता है। ये खून काफी कम मात्रा में भी बैक्टीरिया की पहचान कर सकता है और खून का थक्का जमाने वाले रसायन की वजह से अमेरिकी प्रजाति से लिमुलस एमेबोकाइट लायसेट टेस्ट और एशियाई प्रजाति से टेकीप्लेस एमेबोकायटे लायसेट टेस्ट किए जाते हैं। 
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हॉर्स शू केकड़े - फोटो : Social media
केकड़ों के कवच में उनके दिल के पास छेद करने के बाद तीस फीसदी खून संरक्षित कर लिया जाता है। इसके बाद केकड़े वापस अपनी दुनिया में लौट जाते हैं, लेकिन अध्ययन बताते हैं कि दस से तीस फीसदी केकड़े इस प्रक्रिया में मर जाते हैं और इसके बाद बचे मादा केकड़े प्रजनन में चुनौतियों का सामना करते हैं। 
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हॉर्स शू केकड़े - फोटो : Social media
दुनिया में इस समय हॉर्स शू केकड़ों की चार प्रजातियां बची हैं। ये चारों प्रजातियां जैव चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग के लिए ज्यादा पकड़े जाने और मछली के लिए चारे के रूप में इस्तेमाल किए जाने के साथ-साथ प्रदूषण की वजह से खतरे का सामना कर रही हैं। वैज्ञानिकों का तर्क है कि दुनिया में जनसंख्या के बढ़ने और लंबी जीवन प्रत्याशा की वजह से एलएएल और टीएएल जांचों के बढ़ने की संभावना है। इन केकड़ों के संरक्षण के लिए काम करने वाले जहरीले तत्वों का पता लगाने के लिए सिंथेटिक जांच प्रक्रिया को नैतिक बताते हुए उसका सहारा लेने की मांग करते हैं। लेकिन फार्मास्युटिकल कंपनियों का कहना है कि सिंथेटिक टेस्ट के विकल्पों को ये साबित करना होगा कि वे सिर्फ लैब में बनाए गए कीटाणुओं की पहचान करने में कारगर होने के साथ असली दुनिया में भी कारगर हैं।
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