बिहार खेल, संस्कृति और गर्व के संगम के रूप में एक ऐतिहासिक आयोजन की मेजबानी करने जा रहा है। पहली बार बिहार की धरती पर सेपकटकरॉ वर्ल्ड कप 2025 का आयोजन होने जा रहा है, जिसकी तैयारियां जोरों पर हैं। इस आयोजन को और भी खास बनाने के लिए इसका शुभंकर ‘भीम’ और आधिकारिक लोगो सार्वजनिक किया गया है, जो बिहार की पहचान और परंपरा का जीवंत प्रतीक है। 20 से 25 मार्च के बीच पटना के पाटलिपुत्र खेल परिसर में होने वाले इस आयोजन में 20 अंतरराष्ट्रीय टीमें भाग लेंगी, जो इसे एक भव्य वैश्विक खेल महाकुंभ बना देगा।
सेपकटकरॉ: पारंपरिक खेल से अंतरराष्ट्रीय मंच तक की यात्रा
सेपकटकरॉ, जिसे सेपक टकरॉ, बुका बॉल, किक वॉलीबॉल या फुट वॉलीबॉल के नाम से भी जाना जाता है। यह एक पारंपरिक दक्षिण-पूर्व एशियाई खेल है, जिसकी लोकप्रियता अब विश्वभर में फैल चुकी है। रतन (बेंत) या प्लास्टिक से बनी विशेष गेंद के साथ यह खेल दो से चार खिलाड़ियों की टीमों के बीच बैडमिंटन कोर्ट जैसे मैदान पर खेला जाता है। इसकी तेजी, लचीलापन और रणनीति खिलाड़ियों की तकनीकी दक्षता की परीक्षा लेती है।
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दक्षिण-पूर्व एशिया के मलेशिया, ब्रुनेई, थाईलैंड, म्यांमार, इंडोनेशिया, वियतनाम, फिलीपींस, कंबोडिया और सिंगापुर जैसे देशों में यह पारंपरिक खेल के रूप में लोकप्रिय रहा है। इसके अलावा, चीन, कोरिया और जापान जैसे देशों में भी इसकी अच्छी-खासी उपस्थिति है।
बिहार की परंपरा में रचा-बसा यह खेल
बिहार के संदर्भ में यह खेल कोई नया परिचय नहीं है। राज्य के ग्रामीण अंचलों में वर्षों से यह खेल किसी न किसी रूप में खेला जाता रहा है। खेल पत्रकारों का कहना है कि बिहार में इसे पारंपरिक तौर पर अलग नामों से जाना जाता था। पटना की गलियों में भी कभी यह खेल बच्चों की ऊर्जा और उत्साह का माध्यम रहा है। खासकर, बिहार का पारंपरिक ग्रामीण खेल ‘चौका-डाडी’ इसकी संरचना से काफी मेल खाता है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर बिहार का प्रतिनिधित्व
बदलते समय के साथ यह खेल बिहार के युवाओं में भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। राज्य के उभरते खिलाड़ी बॉबी कुमार, जो वर्तमान में थाईलैंड में भारतीय सेपकटकरॉ टीम के साथ प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं, इस बात का उदाहरण हैं कि किस तरह बिहार की प्रतिभा अब अंतरराष्ट्रीय पटल पर दस्तक दे रही है।
शुभंकर ‘भीम’ और लोगो में समाहित बिहार की पहचान
इस वर्ल्ड कप के लिए जारी किया गया शुभंकर ‘भीम’, बिहार के राज्य पशु भारतीय गौर (गौर बाइसन) से प्रेरित है। इसका ऊर्जावान और दमदार स्वरूप जहां इस खेल की गति और शक्ति को दर्शाता है, वहीं पारंपरिक परिधान में इसकी प्रस्तुति बिहार की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव को प्रकट करती है। भीम, केवल एक प्रतीक नहीं बल्कि उस आत्मबल और संकल्प का रूपक है, जिससे बिहार अपने नए खेल युग की ओर बढ़ रहा है।
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वहीं, वर्ल्ड कप के लोगो में भी बिहार की समृद्ध संस्कृति को बारीकी से दर्शाया गया है। सूर्य की किरणें जहां असीम ऊर्जा और उज्ज्वल भविष्य की प्रतीक हैं, वहीं नालंदा विश्वविद्यालय और मधुबनी कला बिहार की प्राचीन ज्ञान परंपरा और लोक संस्कृति को उभारते हैं। सेपकटकरॉ बॉल खेल की तकनीकी विशिष्टता और रणनीतिक गहराई को दिखाती है, जबकि गोलघर इस राज्य की ऐतिहासिक विरासत का गौरवपूर्ण स्मरण कराता है।
बिहार की मेजबानी में विश्वस्तरीय आयोजन
इस भव्य आयोजन की मेजबानी बिहार के लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि राज्य के खेल क्षेत्र को वैश्विक पटल पर स्थापित करने का एक ऐतिहासिक अवसर है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा लोगो और शुभंकर के अनावरण के साथ यह संदेश भी स्पष्ट हुआ कि बिहार अब केवल सांस्कृतिक विरासत का केंद्र नहीं, बल्कि खेलों का अंतरराष्ट्रीय गढ़ बनने की दिशा में अग्रसर है। सेपकटकरॉ वर्ल्ड कप का संचालन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंटरनेशनल सेपकटकरॉ फेडरेशन (ISTAF) द्वारा किया जाता है। इसकी स्थापना वर्ष 1988 में हुई थी और जो ISTAF सुपर सीरीज जैसे प्रमुख आयोजनों का संचालन करता है।