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बिहार: जातिवादी राजनीति से उभरे नीतीश कुमार, ललन सिंह को सौंपी पार्टी की कमान

Sun, 01 Aug 2021 04:37 AM IST
देव कश्यप कुमार निशांत, पटना

सार

ललन सिंह को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर समाजवादी नीतीश कुमार ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिए दलित, महादलित, कुशवाहा, अति पिछड़ी जातियों के बड़े समूह और स्वर्ण भूमिहारों को अपने पक्ष में किया।
 
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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार - फोटो : twitter.com/NitishKumar
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विस्तार
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समाजवादियों का उत्तराधिकारी बताने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, ललन सिंह को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष का कमान सौंपकर जातिवादी राजनीति से उभर गए हैं।

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ललन सिंह को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर समाजवादी नीतीश ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिए दलित, महादलित, कुशवाहा, अति पिछड़ी जातियों के बड़े समूह और स्वर्ण भूमिहारों को अपने पक्ष में किया। इसके पहले पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करते हुए स्वजातीय व राजनीति में कम अनुभव रखने वाले आरसीपी सिंह को अपनी विरासत सौंप दी थी।

विरासत मिलने के बाद पूरी पार्टी आरसीपी सिंह के हवाले थी। जब केंद्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार हो रहा था तो आरसीपी सिंह स्वयं मंत्रिमंडल में शामिल हो गए। उसके बाद से नीतीश कुमार को पार्टी के लिए ललन सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना जरूरी हो गया था। कहते हैं कि नीतीश कुमार यदि ललन सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बनाते तो पार्टी को संभालना मुश्किल हो जाता।
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आरसीपी सिंह के बाद नीतीश के यदि कोई करीबी हैं तो वह ललन सिंह हैं। ललन सिंह मुंगेर से सांसद हैं। ललन सिंह  2005 में जदयू के प्रदेश अध्यक्ष बने थे। जब नीतीश ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ा था तो उन्होंने पार्टी के समर्पित वरिष्ठ नेता वशिष्ठ नारायण सिंह और केसी त्यागी को दरकिनार कर आरसीपी सिंह को कमान सौंपी थी। उस समय नीतीश ने समाजवाद की जगह जातिवाद को बढ़ावा दिया था।

नीतीश खुद को लोहिया व कर्पूरी ठाकुर की तरह वंशवाद और जातिवाद का विरोधी बताते रहे हैं। दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी ने राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह को पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया है। आरसीपी सिंह ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से अपना इस्तीफा दे दिया है।

दरअसल नीतीश कुमार की पार्टी पर कुशवाहा भी कुर्मी समीकरण साधने के आरोप लगाते रहे हैं और इसका खामियाजा पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को भुगतना भी पड़ा है।

पार्टी में बढ़े कुर्मी वर्चस्व से पार्टी के भूमिहार और दलित नेताओं में नाराजगी थी। पार्टी का दूसरा कोर वोट बैंक कुशवाहा भी पिछले विधानसभा चुनाव में जदयू से थोड़ा नाराज दिखा था। उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी में लाकर नीतीश कुमार ने उसकी भरपाई करने की कोशिश तो कर ली लेकिन भूमिहार मतदाताओं की नाराजगी झेल चुके नीतीश बड़ी राजनीतिक चुनौतियों से घिरा महसूस कर रहे थे। ललन सिंह पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से हैं और नीतीश कुमार के पुराने सहयोगी रहे हैं।

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