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खाकी छोड़ पहनी खादी, जीत के लिए लालू का भरोसा

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चमकते सितारों वाली खाकी की जगह कांग्रेसी खादी पहनकर दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्त निखिल कुमार अब बिहार के इस अति पिछड़े इलाके में अपनी सियासी मंजिल तलाश रहे हैं।
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राजभवन के कालीन बिछे गलियारों को छोड़कर गड्ढों भरे कच्चे पक्के रास्तों पर गांवों की धूल मिट्टी फांक रहे निखिल कुमार कभी दिल्ली पुलिस और सीमा सुरक्षा बल जैसे सशस्त्र संगठनों की कमान संभाल चुके हैं।

निखिल राजपूतों के दबदबे और नक्सलियों के आतंक वाले इस इलाके में लालू यादव के सिपाहियों केबल पर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की चुनौती से निबट रहे हैं।
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बिहार में कांग्रेस राजद गठबंधन के सूत्रधारों में से एक निखिल कुमार की जीत के लिए लालू प्रसाद यादव ने अपने राजद कार्यकर्ताओं से पूरी ताकत झोंक देने को कहा है।

पूर्व राज्यपाल हैं निखिल

देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से को जोड़ने वाली ऐतिहासिक जीटी रोड पर फर्राटे भरते हुए वाहनों को देख कर कतई अहसास नहीं होता कि इस हाईवे से नीचे उतरकर पांच से दस किलोमीटर इधर या उधर जाने के बाद मध्य बिहार स्थित औरंगाबाद इलाका इस कदर भी पिछड़ा हो सकता है कि यहां के कई गावों तक पहुंचने के लिए सड़क तो दूर ढंग का कच्चा रास्ता भी नहीं है।

यहां आकर बिहार के विकास और सुशासन के असली दर्शन होते हैं। यहीं से दूसरी बार कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में हैं पूर्व राज्यपाल और पूर्व पुलिस अधिकारी निखिल कुमार।

उनके मुकाबले भाजपा ने उन सुशील कुमार सिंह को मैदान में उतारा है जो 2004 और 2009 में लगातार यहां से जनता दल(यू) के टिकट पर जीते। लेकिन चुनाव से कुछ पहले पाला बदलकर भाजपा में आ गए।

नीतीश ने भी खेला है दांव

हालांकि औरंगाबाद विधानसभा के भाजपा विधायक रामाधार सिंह ने सुशील कुमार सिंह को भाजपा में लाए जाने का विरोध किया था और उनकी तरफ से असहयोग की खबरें भी इलाके में तैर रही हैं।

जनता दल(यू) ने इस बार बागी कुमार वर्मा को मैदान में उतार है जो अति पिछड़ी जाति दांगी समुदाय से हैं और उन्हें उतारकर नीतीश कुमार ने इस राजपूत बहुल सीट पर अति पिछड़ों और मुसलमानों के वोट बैंक पर दांव लगाया है।

औरंगाबाद लोकसभा सीट की कुल छह विधानसभा सीटों में से औरंगाबाद और गरुआ पर भाजपा का कब्जा है जबकि कुटुंबा, रतिगंज, इमामगंज और टेकारी से जद(यू) के विधायक हैं। तब जद (यू) भाजपा गठबंधन ने सभी छहो सीटें जीती थीं। लेकिन अब दोनों आमने सामने हैं।

पिता की विरासत के नाम पर जीत की उम्मीद

निखिल कुमार 2009 में भी कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़े थे, लेकिन सिर्फ 45 हजार वोट ही उन्हें मिल सके थे। तब राजद और कांग्रेस अलग अलग थे, लेकिन इस बार दोनों का गठबंधन है और इलाके के यादवों में लालू यादव के लिए जोश की बदौलत निखिल कुमार भाजपा से सीधे मुकाबले में आ गए हैं।

उनका चुनाव नतीजा इस पर निर्भर करेगा कि वह अपने सजातीय राजपूत मतों में कितना बंटवारा अपने पक्ष में करा सकते हैं। क्योंकि पूरे बिहार में राजपूत, भूमिहार, वैश्य, कायस्थ जैसी जातियों की गोलबंदी भाजपा और मोदी के पक्ष में साफ दिखाई पड़ रही है।

लेकिन निखिल के समर्थकों का दावा है कि वह अपने पिता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा (छोटे साहब) जो खुद भी कई बार यहां से सांसद रह चुके हैं, की विरासत के बल पर आधे से ज्यादा राजपूतों और अन्य सवर्ण जातियों का वोट हासिल करेंगे।

हार के बाद भी जारी रखा संपर्क

मदनपुर प्रखण्ड स्थित कांग्रेस के स्थानीय चुनाव कार्यालय में बैठे मनोज कुमार सिंह, जुगुल किशोर पासवान, बाल गोविंद पासवान आदि के मुताबिक निखिल कुमार को सभी वर्गों का समर्थन मिल रहा है, क्योंकि बड़े कद और पद के बावजूद उनकी सहजता लोगों को भाती है।

पिछले चुनाव में हार के बावजूद उन्होंने इलाके से नाता नहीं तोड़ा और बराबर आते जाते रहे। फिर राज्यपाल जैसा पद ठुकराकर वह चुनाव मैदान में हैं, इसका असर भी पड़ रहा है।

निखिल कुमार केसाथ दिन रात प्रचार में जुटे राजद नेता वीरेंद्र कुमार कहते हैं कि इस बार राजद का पूरा यादव-मुस्लिम समीकरण छोटे साहब के साथ एकजुट है।

भाजपा को भी है जीत की उम्मीद

लेकिन भाजपा चुनाव कार्यालय में बैठे सुशील कुमार के समर्थक कहते हैं कि सुशील और उनके पिता चार बार यहां से सांसद रहे हैं। पूरे बिहार में भाजपा और नरेंद्र मोदी की लहर है।

राजपूतों का पूरा समर्थन सुशील के साथ है और दूसरी जातियों का बहुमत भी भाजपा के पक्ष में है। लेकिन हाई वे से उतरकर कई किलोमीटर छोटी सड़क, कच्चे रास्ते और खेतों के बीच से होते हुए गांवों से गुजरते हुए जितने भी लोगों से बात हुई, तस्वीर अलग तरह की दिखाई दी।

दुब्बा गांव में एक चौक पर जमा लोगों ने जद(यू) के बागी कुमार वर्मा की जीत का दावा किया।

क्षेत्र में निखिल लहर

यहां मौजूद मंडा पंचायत मुखिया अजय कुमार दास, काज पंचायत मुखिया रामपति दास, कमलेश्वर रजक ने कहा कि सुशील कुमार तो सांसद बनने के बाद दिखाई ही नहीं दिए। जिन नीतीश कुमार की ताकत से लोकसभा में पहुंचे उन्हें ही धोखा देकर भाजपा में चले गए।

इस बार उन्हें पिछड़ी और दलित जातियों को वोट बिल्कुल नहीं मिलेगा। इनका गणित है कि राजपूत वोट बंटेंगे जिसका फायदा भी बागी को होगा।

लेकिन गुरुआ प्रखंड, गोरारु, असनी, बैजू बिगहा, मथुरापुर, इमाम गंज आदि नक्सल प्रभावित गावों में घूमते वक्त बच्चे बच्चे ने निखिल कुमार का नाम लिया और कहा कि मुकाबला पंजा छाप(कांग्रेस) और कमल छाप(भाजपा)के बीच है।
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विकास का तो पता ही नहीं

कोलेश्वर प्रसाद और अनिरुद्ध प्रसाद यादव के मुताबिक कांग्रेस उम्मीदवार की जीत तय है। घरों के दरवाजों पर बैठी और खेतों में काम करती महिलाओं से पूछने पर सीधा जवाब तो नहीं मिला लेकिन किसी किसी ने हाथ का पंजा दिखाकर इशारे से अपनी मंशा जता दी।

इसी बीच बेहद ऊबड खाबड़ कच्चे रास्ते पर धूल उड़ाता हुआ कांग्रेस उम्मीदवार निखिल कुमार का काफिला मिला। ऐसे दूर दराज इलाके में अमर उजाला के प्रतिनिधि को देखकर निखिल कुमार आश्चर्य से भर गए।

किसी भी तरह का दावा न करते हुए उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि मैं अपने दादा जो महात्मा गांधी को चंपारण लेकर आए थे, और अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए इस इलाके के लिए कुछ करने के लिए राजभवन की लाल कालीन छोड़कर राजनीति केपथरीले रास्ते पर आया हूं।
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