पटजिरवा शक्तिपीठ माई स्थान में पूजा करते श्रद्धालु
- फोटो : अमर उजाला
श्रीराम की दसविद्या की स्थापना
इस मंदिर की मान्यता यह भी है कि श्रीराम ने यहां नर और मादा पीपल के वृक्षों के बीच दसविद्या की स्थापना की थी। मंदिर के पीछे मौजूद प्राचीन तालाब, जिसे महाराजा जनक ने खुदवाया था, उस समय के प्रमाण के रूप में आज भी विद्यमान है।
जानकारी के मुताबिक, पटजिरवा देवी मां की चौखट पर प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु आते हैं। यह स्थान न केवल बिहार और उत्तर प्रदेश के भक्तों का धार्मिक केंद्र है, बल्कि देश-विदेश से और पड़ोसी देश नेपाल से भी भक्तजन मां के दर्शन करने आते हैं। यहां की पूजा-प्रक्रिया और आस्था के चलते श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मां हर मनोकामना को पूरा करती हैं।
पटजिरवा शक्तिपीठ माई स्थान में पूजा करते श्रद्धालु
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मंदिर का इतिहास
मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार, जब माता सीता श्रीराम के साथ अयोध्या जा रही थीं, तब राजा जनक द्वारा उनके विश्राम के लिए बनाए गए पड़ाव पर रुकने की बजाय उन्होंने अपनी डोली यहां रखवाई थी। माता सीता ने डोली का पट खोलकर जिस भूमि पर अपने चरण रखे, वह स्थान सिद्ध हो गया। कालांतर में उसी स्थान पर देवी पीठ स्वतः धरती से प्रकट हुईं।
एक अन्य मान्यता नेपाल के इतिहास से जुड़ी है, जिसमें कहा जाता है कि एक शासक की रानी के गर्भपात के बाद उन्होंने पटजिरवा माई स्थान पर 151 दिनों का सर्वशक्ति चंडी महायज्ञ किया। इस यज्ञ के फलस्वरूप उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। इसी घटना से जुड़े लोकगीतों में ‘पट में जीय’ कहकर गीत गाए जाते हैं, जिससे यह स्थान पटजिरवा के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
सिद्धपीठ की महिमा
पटजिरवा माईस्थान को सिद्धपीठ माना जाता है, जहां मां के दर्शन और पूजा से श्रद्धालुओं की हर मुराद पूरी होती है। यहां की धार्मिक और ऐतिहासिक मान्यताएं इसे एक अद्वितीय शक्तिपीठ के रूप में स्थापित करती हैं, जहां आज भी श्रद्धालु बड़ी आस्था और विश्वास के साथ आते हैं।