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बिहार चुनाव के लिए मोदी सरकार ने चला बड़ा दांव

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पिछले आठ दशक में पहली बार किए गए सामाजिक, आर्थिक और जाति आधारित जनगणना की जारी की गई रिपोर्ट में सरकार ने जाति संबंधी आंकड़े जारी नहीं किए हैं।
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माना जा रहा है कि आगामी बिहार विधानसभा चुनाव को देखते हुए ऐसा किया गया है। सरकार ने कहा है कि उसका आर्थिक आंकड़ों से लेना देना है, जिससे कि सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में उसे सहायता मिलेगी।

बिहार चुनाव से पहले जाति के बारे में आंकड़े जारी करने से सरकार के बचने संबंधी सवाल पर ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है। इसे चुनाव से जोड़ना ठीक नहीं है। यह जनगणना महानिदेशक के अधिकार क्षेत्र में आता है। उन्हें तय करना है कि वह क्या सोचते हैं। वे ही टिप्पणी कर सकते हैं।
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80 साल में पहली बार सरकार ने रोके जातिगत आंकड़े

2011 में इस जनगणना के शुरू होने से पहले जाति आधारित गणना को लेकर विवाद पैदा हो गया था। विभिन्न दलों के ओबीसी नेताओं ने इसमें जाति को शामिल करने की कड़ी वकालत की थी। इसमें सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव, राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और जदयू अध्यक्ष शरद यादव के नाम आगे थे।

उन्होंने संसद के भीतर और बाहर कहा था कि इससे ओबीसी आबादी का पता चलेगा। यूपीए सरकार में भी गहरे मतभेद थे। विरोध करने वालों की दलील थी इससे आरक्षण पर नए सिरे से विचार की मांग उठेगी।

1931 की जनगणना में जाति, धर्म, समुदाय और आर्थिक समूह को शामिल किया गया था। माना जा रहा है कि जाति आधारित आंकड़े जारी न कर सरकार बिहार चुनाव से पहले राज्य में ओबीसी राजनीति को हवा देना नहीं चाहती।
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