अशोका फिल्म में शाहरुख की मां के रोल में दिखी थीं पूर्व सांसद सुभाषिनी अली।
पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लिखी गई हैं यह बातें
जनवादी महिला समिति की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और पूर्व सांसद सुभाषिनी अली आगे फिर हमलावर हुईं। कहा- “मुझे लगता है कि आपने जहां भी दूसरी पार्टियों और नेताओं का राजनीतिक विश्लेषण किया है, थोड़ा पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर किया है। जैसा कि कम्युनिस्ट के बारे में। अब आप जेपी आंदोलन के बारे में लिख रहे हैं और लिख रहे हैं कि वाम नेता कमरे छोड़कर चले गए, भाग गए। आपकी यह बात बिल्कुल गलत है। तमाम आलोचनाओं के बावजूद सीपीआई के लोग पूरी निष्ठा के साथ जेपी आंदोलन के साथ रहे। हमारे लोग भी जेल गए। और, माफ कीजिएगा लेखक महोदय, हमारी पार्टी के किसी भी साथी ने माफी नहीं मांगी जेल में जाकर। यह माफी मांगने वाले लोगों की नस्ल दूसरी है। हम लोगों के साथी जो यहां बैठे हुए हैं, उनकी नस्ल अलग है।"
यह दो कूदे तो क्रांति हो गई...ऐसा नहीं है
सुभाषिनी अली ने कहा- “ऐसा नहीं है कि जेपी आंदोलन में जैसे नीतीशजी और लालूजी कूद पड़े तो क्रांति की तस्वीर देखने लगी। उस तरह की तस्वीर हमने नहीं देखी और हम अकेले नहीं थे। आपने अपनी किताब में बहुत बढ़िया बात डाली है कि बक्सर जेल में उस समय बाबा नागार्जुन थे। वह भी बंद हुए थे इसी आंदोलन में। वह बक्सर जेल में थे और शुरू-शुरू में उन्होंने आंदोलन के समर्थन में खूब कविताएं लिखी। लेकिन, उनके साथ एक आरएसएस वाला था और उससे इतने पीड़ित हो गए कि वे आंदोलन के आलोचक बन गए। आरएसएस वाला उनपर इस कदर हावी हुआ कि उनकी आलोचना बढ़ती चली गई और आखिर में उन्होंने उस आंदोलन का नाम खिचड़ी क्रांति रख दिया। संपूर्ण क्रांति की बजाय खिचड़ी क्रांति... और शायद उन्होंने कुछ गलत भी नहीं किया। किसी को बुरा लग जाए मेरी बात का... तो यह मेरी बात नहीं। यह बाबा नागार्जुन की बात है। उनसे लड़ने का हौसला है तो आप उन्हीं से लड़िये, मुझसे मत लड़िये।"
लालू पर पूवाग्रह से ग्रसित लगते हैं आप
पूर्व सांसद ने कहा- “हम लालूजी का बहुत सम्मान करते हैं। लालूजी के बारे में भी आपका विश्लेषण पूर्वाग्रह से ग्रसित है। उनकी बहुत सारी खूबियां, उनका जलवा, उनका जुनून और उनकी दरियादिली के बारे में मुझे लगता है आपने पूरी इमानदारी इसमें नहीं की है। हमने देखा है कि नेताओं के बीच अनबन हो गई। हम भी सोचते रहे कि भाई नीतीशजी आखिर लालूजी से क्यों नाराज हुए! मुझे लगता है कि अब उस नाराजगी को भूलने का समय आ गया है क्योंकि लालूजी ने हमेशा उनकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया और केवल दोस्ती का हाथ ही नहीं बल्कि राजनीति में बहुत कम देखने को मिलता है कि बहुत उदारता के साथ दोस्ती का हाथ उनकी तरफ बढ़ाया। उसके जो परिणाम आए, यह आज किसी से छुपे हुए नहीं है।"