Election In Bihar 2020: कोरोना महामारी के दौर में बिहार में चुनाव हो रहे हैं। एक बार फिर चुनाव प्रचार और मतदान आदि की पटकथा लिखी जाने लगी है। इस चुनावी माहौल के बीच हम आपको रूबरू कराते हैं उस बिहार से, जहां पहला विधानसभा चुनाव आजादी के बाद देश के पहले आम चुनाव के साथ हुआ था। साथ ही, आपको बताएंगे कि कौन बना था राज्य का पहला मुख्यमंत्री? और उस वक्त राज्य में चुनावी माहौल कैसा था?
आपको बता दें कि करीब 70 साल पहले 1951-52 के दौरान आजाद भारत में पहले लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हुए थे। उस दौरान बिहार के साथ-साथ पूरे देश में राजनीतिक माहौल बना हुआ था। राजनेता रोचक नारों के साथ अपने वादों से जनता को अपनी तरफ मोड़ने की कोशिश करते थे, जबकि दिग्गज नेता साइकिल पर रैली करते थे।
उस दौरान महिलाएं बैलगाड़ियों में बैठकर मतदान केंद्र जाती थीं। उस वक्त वोट डालने के लिए अलग-अलग रंग के बक्से होते थे, जिन पर पार्टी के चुनाव चिह्न बने होते थे। दरअसल, उस वक्त कम पढ़ी-लिखी आबादी के लिए ऐसा किया जाता था, जिससे वो अपने प्रत्याशी को ही वोट डालें। वैसे देखा जाए तो आजादी के बाद 1952 के दौरान बिहार में हुआ पहला विधानसभा चुनाव उत्साहपूर्ण होने के साथ-साथ चुनौतीपूर्ण भी था।
1952 में नहीं थे खास मुद्दे
1952 के दौरान कुछ भौतिक नियम तय किए गए थे। वैसे उस वक्त लोग प्रचार और मुद्दों को लेकर काफी ज्यादा जागरूक नहीं थे। आजादी की लड़ाई के चलते कांग्रेस पार्टी काफी ज्यादा लोकप्रिय थी। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व आईपीएस अफसर और पूर्व कांग्रेस सांसद निखिल कुमार बताते हैं कि उस वक्त कांग्रेस पार्टी ने अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत अपने चुनाव चिह्न ‘दो बैलों की जोड़ी’ और नारे के साथ की थी। निखिल कुमार बताते हैं कि उस वक्त 79 साल के उनके दादाजी डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा बिहार के पहले उप-मुख्यमंत्री बने थे, जबकि उनके पिता एसएन सिन्हा राज्य के 19वें मुख्यमंत्री बने।
Bihar Election 2020 Updates: 'पैदा किए नौ बच्चे...' नीतीश के तंज पर तेजस्वी का पलटवार
नेहरू थे पूरे देश के हीरो
कांग्रेस नेता शकील अहमद बताते हैं कि उस वक्त जश्न का माहौल था, क्योंकि देश आजाद होकर ही चुका था। समाज के हर तबके के लोग पूरी तरह कांग्रेस के साथ थे। जवाहर लाल नेहरू पूरे देश के हीरो थे। आपको बता दें कि शकील के पिता शकूर अहमद ने 1952 में खजौली सीट पर चुनाव जीता था। शकील बताते हैं कि विभाजन ने भारतीय मुस्लिमों को खौफजदा कर दिया था, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें भरोसा दिलाया। उस वक्त बिहार की पूरी आबादी नेहरू के साथ थी।