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बिहार: जानिए ऑनलाइन पिंडदान पैकेज पर क्यों भड़का पंडा समाज? बोला- यह पर्यटन नहीं, मोक्ष और आस्था का विषय

Wed, 16 Sep 2026 08:04 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गयाजी

सार

पितृपक्ष मेला-2026 के लिए बिहार पर्यटन विभाग द्वारा जारी ऑनलाइन ई-पिंडदान और विशेष पर्यटन पैकेज का गयाजी के पंडा समाज ने कड़ा विरोध किया है। विष्णुपद मंदिर परिसर में आयोजित वार्ता में पंडा समाज ने कहा कि पिंडदान कोई पर्यटन गतिविधि नहीं, बल्कि सनातन आस्था और मोक्ष से जुड़ा धार्मिक अनुष्ठान है, जिसे ऑनलाइन माध्यम से पूरा नहीं किया जा सकता।
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प्रेसवार्ता करते गयाजी के गेवाल पंडा व अन्य
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विस्तार
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पितृपक्ष मेला-2026 के लिए बिहार पर्यटन विभाग द्वारा जारी ऑनलाइन ई-पिंडदान और विशेष पर्यटन पैकेज का गयाजी के पंडा समाज ने कड़ा विरोध किया है। विष्णुपद मंदिर परिसर में पंडा समाज ने कहा कि पिंडदान कोई पर्यटन गतिविधि नहीं, बल्कि सनातन आस्था और मोक्ष से जुड़ा धार्मिक अनुष्ठान है, जिसे ऑनलाइन माध्यम से पूरा नहीं किया जा सकता।

पर्यटन विभाग ने जारी किए विशेष पैकेज

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गयाजी में 25 सितंबर से 10 अक्टूबर तक आयोजित होने वाले पितृपक्ष मेला-2026 को लेकर पर्यटन विभाग ने देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष पिंडदान पर्यटन पैकेज जारी किए हैं। बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम लिमिटेड की ओर से एक दिवसीय, एक रात-दो दिन के पैकेज के साथ ऑनलाइन ई-पिंडदान की सुविधा भी शुरू की गई है। इन पैकेजों में पिंडदान अनुष्ठान, धार्मिक स्थलों के दर्शन, परिवहन, आवास, भोजन, पंडा-पुजारी की सेवाएं और पूजन सामग्री को शामिल किया गया है, ताकि श्रद्धालु अपनी सुविधा और बजट के अनुसार पैकेज चुन सकें।

विष्णुपद मंदिर में पंडा समाज ने जानें क्या कहा?
पर्यटन विभाग की इस पहल का गयाजी के पंडा समाज ने खुलकर विरोध किया। बुधवार को विष्णुपद मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में पंडा समाज के लोग एकत्र हुए और प्रेसवार्ता कर सरकार के फैसले पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि सरकार को पिंडदान जैसी धार्मिक परंपरा को पर्यटन पैकेज का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए।

गयाजी पर्यटन स्थल नहीं, मोक्ष की नगरी

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पंडा समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि गयाजी केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि मोक्ष की नगरी है। यहां पिंडदान की परंपरा सदियों पुरानी है और शास्त्रों के अनुसार, पितरों की मुक्ति के लिए श्रद्धालु का स्वयं गयाजी आकर विधि-विधान से पिंडदान करना आवश्यक माना गया है। उनका कहना था कि जैसे माता-पिता अपने बच्चों के लिए कठिनाइयों का सामना करते हैं, उसी प्रकार संतान को भी अपने पितरों के प्रति कर्तव्य निभाने के लिए स्वयं उपस्थित होकर पिंडदान करना चाहिए।

ऑनलाइन से नहीं मिलेगा पितरों को मोक्ष
पंडा समाज ने ऑनलाइन ई-पिंडदान व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि पिंडदान कोई वस्तु नहीं है, जिसे ऑनलाइन खरीद लिया जाए। यह पूरी तरह श्रद्धा, विश्वास और धार्मिक परंपरा से जुड़ा अनुष्ठान है। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन माध्यम से श्रद्धालु यह कैसे जान पाएंगे कि विष्णुपद मंदिर या अन्य वेदियों पर विधि-विधान से पिंडदान हुआ या नहीं अथवा उनके पूर्वज किस पंडा परिवार से जुड़े थे। ऐसे में ऑनलाइन व्यवस्था से धार्मिक परंपरा और आस्था दोनों प्रभावित होंगी।

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सरकार से निर्णय वापस लेने की मांग
पंडा समाज ने सरकार से ऑनलाइन ई-पिंडदान व्यवस्था और पर्यटन पैकेज में किए गए प्रावधानों पर पुनर्विचार करने की मांग की। उनका कहना है कि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए अन्य व्यवस्थाएं की जा सकती हैं, लेकिन पिंडदान जैसी सनातन धार्मिक परंपरा को ऑनलाइन माध्यम से जोड़ना उचित नहीं है। पंडा समाज ने चेतावनी दी कि यदि इस निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो आगे भी विरोध जारी रहेगा।

 

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