नीति आयोग की टीम के साथ गांव के लोग
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आजादी के 77 साल के बाद भी आज तक बिहार-झारखंड की सीमा पर फतेहपुर प्रखंड के गुरपा में निवास करने वाले बिरहोर जनजाति के लोग समाज की मुख्य धारा में नहीं जुड़ सके हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार इन्हें समाज की मुख्य धारा में जोड़ने के लिए कदम नहीं उठा रही है। लेकिन, जागरुकता की कमी कहें या अधिकारियों में इच्छा शक्ति की कमी। आज भी बिरहोर जनजाति के लोगों की सामाजिक दशा में सुधार नहीं हो सका है।
हालांकि, सोमवार को नीति आयोग के सलाहकार सुधेन्दु जे. सिन्हा द्वारा इस टोले का दौरा किए जाने के बाद इस जनजाति से जुड़े लोगों में विकास की एक आस जगी है। सोमवार को निरीक्षण के दौरान नीति आयोग के सलाहकार सिन्हा ने बिरहोर टोला में पहुंचकर उनकी मूलभूत समस्याओं की जानकारी ली। इस दौरान टोले के लोगों ने उनसे सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की।
शौचालय और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी से जूझ रहे बिरहोर
इस टोले में बिरहोर जनजाति के 20 परिवारों के करीब 75 लोग निवास करते हैं। सरकार उनके उत्थान के लिए चाहे जो भी दावे कर ले। लेकिन, हकीकत यही है कि ये आज भी फाकाकशी की जिंदगी जीने के लिए विवश हैं। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज तक इस गांव में लोगों के लिए न तो स्वास्थ्य केंद्र की सुविधा उपलब्ध है और न ही शौचालय की।
बिना दरवाजे के जर्जर आवास में रहने को मजबूर हैं लोग
गांव के करीब डेढ़ दर्जन परिवारों को सरकार द्वारा करीब 15 वर्ष पहले इंदिरा आवास की सुविधा प्रदान की गई थी। लेकिन, प्रशासन द्वारा उन्हें उपलब्ध कराए गए मकानों में आज तक न तो प्लास्टर हुआ है। न ही मकानों में दरवाजे और खिड़कियां ही लगाई गई हैं।
बिरहोर जनजाति के विकास के लिए काफी काम करने की जरुरत : सिन्हा
बिरहोर जनजाति के विकास के लिए सरकार द्वारा काफी योजनाओं का संचालन किया जा रहा है। पिछले दिनों यहां भी काफी कुछ किया गया है। लेकिन, अब भी इनके विकास के लिए काफी कार्य किए जाने की जरूरत है।
सुधेन्दु जे. सिन्हा, सलाहकार, नीति आयोग