पीएम मोदी के साथ रोड शो में सीएम नीतीश कुमार की इस तस्वीर के साथ लोग पूछ रहे तबीयत पर सवाल।
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कुछ तो गड़बड़ है, सवाल हर तरफ उठ रहा
अब पिछले रविवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रोड शो में उनकी गाड़ी पर दिखे तो यह बात तेजी से उठी… कि कुछ तो गड़बड़ है। इसके 24 घंटे बाद ही पांच दशकों पुराने उनके साथी सुशील मोदी के निधन की खबर सामने आयी और उसके अगले दिन सरकार की ओर से बताया गया कि मुख्यमंत्री बीमार हैं, इसलिए उनकी सारी सार्वजनिक गतिविधियां स्थगित की जा रही हैं। यह समझ में आया कि पुराने साथी का इस तरह साथ छोड़ना उन्हें मानसिक रूप से परेशान कर गया होगा। लेकिन, मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर से नीतीश कुमार की बीमारी को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। हालत यह है कि मुख्यमंत्री सचिवालय के अधिकारी इस सवाल को सीधे टाल जा रहे हैं कि वह किस तरह से बीमार हैं। आम जनता यह जानना चाह रही है कि नीतीश कुमार की बीमारी का वास्ता उनकी मानसिक स्थिति से तो नहीं है और अगर ऐसा है भी तो उनका इलाज सही तरीके से हो रहा है या नहीं। वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी कहते हैं कि “ऊर्जा से ओतप्रोत, सजग, हंसमुख और मिलनसार नीतीश कुमार थके-हारे, निराश-हताश, परेशान और बीमार लग रहे हैं। सवाल उठना लाजिमी है कि उनकी ऐसी स्थिति इतनी जल्दी कैसे बदलगी? क्या वह बीमार हैं? परेशानी राजनीतिक है या शारीरिक-मानसिक, लोग जानना चाहते हैं। इसलिए, हेल्थ बुलेटिन की मांग कहीं से भी गलत नहीं है।”
देश के नामी फिजिशियन पटना में, उन्हें भी नहीं पता
‘अमर उजाला’ ने राज्य के कई प्रतिष्ठित चिकित्सकों के साथ उनके करीबी रहे पद्मश्री डॉ. गोपाल प्रसाद सिन्हा से भी बात की। उन्होंने कहा कि इस बारे में न तो उन्हें जानकारी है और न किसी ने उन्हें बुलाया है। डॉ. गोपाल प्रसाद सिन्हा फिजिशियन और न्यूरो विशेषज्ञ के रूप में देशभर में विख्यात हैं। उन्हें जब जानकारी नहीं और सरकार की ओर से बुलेटिन नहीं जारी हो रहा तो जदयू-भाजपा के नेताओं की हालत समझी जा सकती है। दोनों दलों के दिग्गजों से पूछने पर जवाब मिला- “तबीयत खराब है।” सवाल वहीं रह गया कि हुआ क्या है कि आखिर अपने इतने करीबी मित्र की अंत्येष्टि और अपनी पत्नी की पुण्यतिथि पर नहीं जाने का मतलब कुछ तो ज्यादा परेशानी है, क्योंकि सामान्य बुखार में तो वह पहले ऐसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को दरकिनार नहीं करते थे। सिर्फ कोरोना के समय ही उन्होंने ‘दूरी, जरूरी’ का फॉर्मूला स्वीकार किया था।