तालाब से रोहू मछली के सैंपल लेती मत्स्य कॉलेज की टीम
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बिहार के दरभंगा के मिथिलांचल में उपजने वाले मखाना को जीआई टैग मिलने के बाद अब मिथिला की प्रसिद्ध रोहू मछली को भी जीआई टैग दिलाने की कोशिश तेज हो गई है। मिथिला की रोहू अपने विशेष स्वाद के लिए पहले से ही विख्यात है। इसके लिए किशनगंज मत्स्य महाविद्यालय की तीन सदस्यी टीम दरभंगा के जिला मत्स्य पदाधिकारी के साथ मिलकर कई तालाबों से सैंपल इकट्ठा करके एक विशेष रिपोर्ट केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय को भेजने वाली है।
दरभंगा मत्स्य विभाग द्वारा जारी आंकड़े के अनुसार प्रतिवर्ष जिले में 17 हजार टन रोहू मछली का उत्पादन किया जाता है। जबकि कतला और नैनी सहित कई अन्य प्रजातियों की मछली का उत्पादन प्रतिवर्ष 75 हजार टन के करीब होता है। इस उत्पादन को देखते हए किशनगंज के मत्स्य पालन महाविद्यालय के डीन डॉ. वेद प्रकाश सैनी के नेतृत्व में एक टीम दरभंगा पहुंची है। जो जिले के हायाघाट प्रखंड के होरलपटी गांव के गंगासागर तालाब और सदर प्रखंड के सोनकी गांव में बड़की तालाब का निरीक्षण किया है।
जिला मत्स्य पदाधिकारी अनुपम कुमार ने बताया कि किशनगंज से मत्स्य कॉलेज से एक टीम आई है जो टीम सोनकी व हायाघाट के होरलपटी के तालाब में करीब 10 से 15 वर्ष पुरानी प्रजाति की रोहू मछली को देखकर अवलोकन किया है। इस दौरान टीम ने दो अन्य जगहों से भी रोहू मछली के लिए सैंपल से मिलान करते हुए कहा कि रोहू मछली एक विशिष्ट प्रजाति में से एक मानी गई है।
उन्होंने बताया कि जिले के तालाबों से लिए गए सैंपल को किशनगंज स्थित मत्स्य महाविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र पूसा और विशेषज्ञ टीम अपनी रिपोर्ट को तैयार करके केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय को सौंप देगी। इसके बाद केंद्र सरकार जीआई टैग देने पर विचार करेगी। इसे लेकर मत्स्य पालकों का कहना है कि मिथिला की रोहू को जीआई रैग मिलने से विशेष पहचान के साथ-साथ वैश्विक बाजार भी मिलेगा। इससे मत्स्य पालकों की आमदनी भी बढ़ेगी।