बाबा हरसू ब्रह्म की कहानी
मंदिर के संयोजक राज कुशोर चैनपुरी बाबा के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि दो राक्षस उत्कल और ब्रजदन्त दोनों ने कभी आतंक मचाया था। सभी देवता परेशान होकर भगवान शंकर की तपस्या करने लगे। तब शंकर ने उत्कल को त्रिशूल से बध कर दिया तो ब्रजदन्त ने महिला रूप धारण कर लिया। शंकर ने उसे कलयुग में मिलने का श्राप दिया। वहीं, शंकर के रूप में हरसू बाबा ने अवतरित हुए और ब्रजदन्त राक्षस के रूप में राजा शालिवाहन की पत्नी माणिक मति अवतरित हुईं।
बाबा हरसू राजा शालिवाहन के राजपुरोहित थे। राजा अपने सभी शुभ कार्यों को हरसू बाबा के आदेश से कराते थे। पूर्व के श्राप के कारण राजा का वंश नहीं आगे बढ़ा तो राजा ने अपने पुरोहित हरसू बाबा से पूछा कि मेरा वंश कैसे चलेगा तो उन्होंने दूसरी शादी करने का सलाह दी। छतीसगढ़ के राजा भूदेव सिंह की पुत्री ज्ञान कुंवरी से शादी हो गई, जिससे दुखी होकर राजा के पहली रानी ने हरसू बाबा को प्रताड़ित कराने लगी। उनके महल को भी ध्वस्त करा दिया, जिससे दुखी होकर हरसू बाबा ने राजा के महल में 21 दिन बिना अन्य जल के पड़े रहे।
उसके बाद उन्होंने अपना प्राण त्याग दिया। इसकी सूचना जैसे ही माता हंस रानी को मिली तो हाथ में दीपक हरसू बाबा के नाम पर तप करते जल कर भस्म हो गई। उसके बाद राजा शालिवाहन का विनास हो गया। तब से हरसू ब्रह्म पूजने लगे, आज देश-विदेश से भी लोग आते हैं और अपनी समस्या का निदान करवाते हैं। भूत पिचास का सुप्रीम कोर्ट माना जाता है।