पटना से एम्स दिल्ली के लिए ले जाए गए थे लालू प्रसाद यादव (फाइल फोटो)
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लालू यादव रौ में रहे तो लोकसभा चुनाव वाला डर
बिहार में जब लालू प्रसाद यादव सत्ता में आए थे, तभी से कांग्रेस की भूमिका लगातार सिमटती गई। मुख्यमंत्री राबड़ी देवी थीं, तब भी कांग्रेस को लालू ने नियंत्रित किए रखा था। लेकिन, अब तो लंबे समय से कांग्रेस लालू के इशारे पर ही चलने को मजबूर है। कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार के आने के पहले अखिलेश प्रसाद सिंह थे तो यह बात और ज्यादा जोर से कही जाती थी। नए अध्यक्ष की लालू के सामने क्या चल सकेगी, यह भविष्य के गर्त में है। फिलहाल लोकसभा चुनाव 2024 वाला डर कमोबेश सभी कांग्रेसियों को याद आ रहा है। दिल्ली में कांग्रेस राजद और वामदलों के साथ बिहार की लोकसभा सीटों के बंटवारे की चर्चा ही करती रही थी, इधर लालू ने अपने प्रत्याशियों को चुनाव चिह्न बांटना शुरू कर दिया था।
सीट बंटवारे से पहले कांग्रेस की दावेदारी निबटा दी थी
लालू प्रसाद यादव ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और वामदलों से सीट बंटवारे के पहले ही अपने प्रत्याशियों को सिम्बल देना शुरू कर दिया था। कांग्रेस में तब नए-नए शामिल हुए राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव पूर्णिया लोकसभा सीट पर तैयारी करते ही रह गए थे और जदयू से इस्तीफा देकर आईं राज्य की पूर्व मंत्री बीमा भारती ने लालू के घर आकर इस सीट पर राजद का सिम्बल ले लिया। यह खबर खूब चर्चा में इसलिए भी रही कि कांग्रेस चाहकर भी पप्पू यादव के साथ नजर नहीं आई, हालांकि निर्दलीय उतर कर भी वह जीत गए। यह तो बाद के चुनावी चरण का मसला था। इसके पहले, शुरुआती चरण में भी जब सीट शेयरिंग का मामला दिल्ली में घूम रहा था, लालू ने घर बुलाकर गया से कुमार सर्वजीत, नवादा से श्रवण कुशवाहा, औरंगाबाद से अभय कुशवाहा, जमुई से अर्चना रविदास आदि को टिकट दे दिया।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की अपील भी गई बेकार, नाम आते रहे
कांग्रेस से डील हुए बगैर ही उजियारपुर से आलोक मेहता, जहानाबाद से सुरेंद्र यादव, महाराजगंज से रणधीर सिंह, बक्सर से सुधाकर सिंह, सारण से रोहिणी आचार्या, पाटलिपुत्र से मीसा भारती, बांका से जय प्रकाश नारायण यादव, मुंगेर से कुमारी अनिता आदि का नाम घोषित कर दिया गया था। कई ने खुद ही सिम्बल मिलने की जानकारी दी थी। हालत यह थी कि तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह को ऐसे कई नामों और तस्वीरों को देखने के बाद राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के पास जाकर अपील करनी पड़ी थी कि ऐसा नहीं करें, हालांकि उससे कोई अंतर नहीं पड़ा था। कांग्रेस सिर्फ 'महागठबंधन के लिए यह अच्छा नहीं है' बोलने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकी थी।
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